November 22, 2025

Hindi Poem कभी यहांँ कभी कहीं


सीढ़ी जो उपर जाती है
वो नीचे भी ले आती है
ना तुम चल के आते हो
ना हम चढ़ के जाते हैं

अब अपनी मुलाक़ातें
यूँ अचानक नहीं होती
फिर भी हम मिलते हैं
कभी यहांँ कभी कहीं 


© Ratish
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September 09, 2025

Hindi Poem पात्र




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© Ratish

September 08, 2025

Hindi Poem गुरु




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September 07, 2025

Hindi Poem परतें




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September 06, 2025

Hindi Poem नदी



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September 05, 2025

Hindi Poem क्या है और क्या नहीं




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September 04, 2025

Hindi Poem तेरे जैसा मैं





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September 03, 2025

Hindi Poem मदहोशी




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September 02, 2025

Hindi Poem गिरफ्तारी




© Ratish

2 Sep 2025 Bilaspur 

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September 01, 2025

Hindi Poem तुम पे छोड़ा है



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© Ratish

August 31, 2025

Hindi Poem संसारं महानाटकमिदं



संसारं महानाटकमिदं!

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August 30, 2025

Hindi Poem पशुपति



शिवार्पणं 

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August 27, 2025

Hindi Poem कोई सीधा हिसाब भी नहीं



© Ratish

27 August 
Bilaspur 

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August 11, 2025

मेरा जुनून


एक तू है
एक तेरा फितूर
साथ है
कभी पास, कभी दूर
एक मैं हूंँ
एक मेरा जुनून
घुलता रगों में जैसे
धड़कन से खून 

© Ratish
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August 07, 2025

कौन है असल कौन असर


दीवानों सा ही अक्सर
देखते हैं जब देखते हैं

दुआ हो या कोई कहर
सोचते हैं तब सोचते है

मय हो या तुम हो ज़हर
जाम तेरा सिर आँखों पर

कौन है अस्ल कौन असर
कौन करे किसे मुकम्मल

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© Ratish

August 03, 2025

Hindi Poem भक्त याचक लगता है


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© Ratish
3 Aug 25
Bilaspur 

July 06, 2025

Sanskrit Readings भवभूति - तत्तस्य किमपि द्रव्यं यो हि यस्य प्रियो जनः

न किञ्चिदपि कुर्वाणः
सौख्यैर्दुःखान्यपोहति।
तत्तस्य किमपि द्रव्यं 
यो हि यस्य प्रियो जनः॥
                                             भवभूति


बिना कुछ भी किये सुख से (भरता, अनुभूति कराता  है) और दुःखों को दूर करता है - जो जिसका प्रिय है वह उसका निश्चय ही अनमोल धन है।
सौख्यै: = सुख से (तृतीया बहुवचन) 
दुःखानि = दुःख को (द्वितीयाबहुवचन) 
अपोहित = दूर करता है 
दुःखानि+अपोहित = दुःखान्यपोहति (यण सन्धि)
Without doing anything they cause pleasure and remove afflictions. Therefore those you love are surely your treasures.

#सूक्ति #संस्कृत #aphorisims #Bhavabhuti #Sanskrit

May 25, 2025

सहज मैं हो गया


जीवन के मधु और कटु
पलों को अधरों से लगा
पी चुका था
गरलामृत का घड़ा

स्वेद रक्त धूल से
कलुषित तन में
हो गया था क्लिष्ट
अंतःकरण मेरा

शीतानिल मेघ-वृष्टि से
जैसे धुलती है धरा
तुम से मिल
सहज मैं हो गया 

25 May

© Ratish

May 24, 2025

सिखा दिया तुमने


मुझे फिर से सिखा दिया तुमने 
कोई आईना दिखा दिया तुमने
उलझ गया था लफ्ज़ों में कहीं 
ख़ामोशी से मिला दिया तुमने 

कहना आता था करना आता था 
चलना आता था बहना आता था
होना और रहना सिखा दिया तुमने 
मुझको मुझसे ही मिला दिया तुमने

24 May
© Ratish

May 21, 2025

अब तुम मेरे भीतर हो और बाहर भी

अब तुम मेरे भीतर हो और बाहर भी
ठीक किसी प्रिय स्मरणीय गीत की तरह
बजता है तो बाहर से सुनाई देता है
पढ़ लूं, तो भीतर से सुर-संगीत उभरते हैं

अब तुम मेरे भीतर हो और बाहर भी
ठीक किसी स्वजन मित्र मनमीत की तरह
बाहर हो जब मिलते हो या संवाद होता है
वर्ना भीतर तेरी यादों की जुगाली करता हूंँ

रतीश
21 May

© Ratish
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May 19, 2025

Hindi Poem: रहेगा वो

जब यादें मद्धम होगीं 
तब जाने क्या रह जाएगा 
जब यादें मद्धम होगीं 
तब कौन पास आएगा
होगी एक दिन रौशनी 
नज़रों की भी मद्धम
रंगों, चेहरों और जगहों 
को फिर कौन देख पाएगा 
एक दिन ये आवाज़े 
भी होंगी मद्धम 
कौन कहेगा कौन सुनेगा 
कौन समझ पाएगा 
ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेंद्रियांँ 
भी सब होंगे मद्धम
अंतःकरण का प्रभाव 
भी क्षिण हो जाएगा 
रहेगा वो जो था, है और रहेगा सदा
बाकी सब क्रमशः जीर्ण होता जाएगा 

19 May
रतीश

अंतःकरण = मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार

© Ratish

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May 03, 2025

Hindi Poem कितना तन्हा हूंँ

जाने क्यों होती है सहर हर रात के बाद 
जाने क्या रह जाता है हर बात के बाद
तुझसे मिलकर मैं खुद से मिलता हूंँ
जाने क्या होता है मुलाकात के बाद 
अब तो अपना मिलना भी नहीं होता
कितना तन्हा हूंँ ऐसे हालात के बाद 

रतीश
3 May

© Ratish

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May 01, 2025

इस ओर से उस ओर

वक्त की डोर ले चली है
इस ओर से उस ओर
हम भी क्या से क्या हो गए
इस ओर से उस ओर

जाने कब कैसे ऐसे हो गए
रिश्तों से महंगे पैसे हो गए
जाने कब चुन ली हमने खुशी 
की जगह संघर्ष और शोर

तुम भी मुझे थाम तो सकते थे
दो घड़ी आराम के हो सकते थे
है तुम्हारा भी मेरे जैसा ही हाल
अपने अपने चक्रव्यूह का जंजाल

सोचो या कुछ भी नहीं सोचो
करो या कुछ भी नहीं करो
सबसे बिसरेगा ही यह ठौर
जाना है इक छोर से दूजे छोर

फिर भी क्या सोचे जाते हैं
फिर भी क्या करे जाते हैं
जिंदगी को कौड़ियों में लुटाते
गुजरते इस ओर से उस ओर

रतीश
1 May


© Ratish

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April 30, 2025

हर रोज़ बदलता हूंँ

कुछ रोज़ पुराने अखबारों सा
रद्दी में पड़ा रहता हूंँ
कभी आनेवाले पल के लिए
कतारों में खड़ा रहता हूंँ

हर रोज़ बदलता हूंँ लेकिन
खुद को वहीं कहता हूंँ
अपनी यादों, इरादों के संग
पुराने घर में ही रहता हूंँ

रतीश
30-Apr

© Ratish
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April 16, 2025

कोई मलाल मत रखना

मेरे जैसा तुम अपना हाल मत रखना
दिल में अपने कोई मलाल मत रखना
रखना सब संजोए जो भी होकर गुजरा
जो नहीं हुआ उसका ख्याल मत रखना

रतीश
16 Apr


© Ratish



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April 12, 2025

Hindi Poem मुस्काए हुए हैं

माना तेरे नूर से रौशन नहीं हम
अंधेरे भी तुमसे ही छाए हुए हैं
दुनिया में बहुत कुछ है लेकिन
ध्यान अंदर अपने लगाए हुए हैं

बाजा़र में दाम लगा है सबका
झोला हम भी लटकाए हुए हैं
वक्त की चाल में देख अपनी हालत
हालात खयालात पे मुस्काए हुए हैं
रतीश
12 Apr


© Ratish


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April 05, 2025

When will we live

We are no longer young
We are not yet too old
We don't like to do
What we have been told
We have lost our innocent smile
Too much has passed in front of our eyes
Triumph, passion, power, purpose, love and grief
Are precious colored candies
we run after in misbelief
Time is constantly fleeting ahead and away
When will we live, rejoice, find our true way

Ratish
5 Apr
Bilaspur 
© Ratish

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April 02, 2025

तुम पूर्व स्वर्ण रश्मि

तुम पूर्व स्वर्ण रश्मि सम प्रखर
मैं मेघाच्छादित घनश्याम प्रिये
तुम चंदन का तरुण तरुवर
मैं उसपे लिपटा नाग प्रिये
तुम अलकनन्दा का शीतल जल
मैं प्रचण्ड दावानल की आग प्रिये
तुम जीवन का सुखमय पल
मै रुधिर की रिसती धार प्रिये
तुम आज मेरा, तुम बीता कल
तुम कल होने वाला प्यार प्रिये
बस डरता हूंँ कुछ कहने से
कहीं दो ना तुम दुत्कार प्रिये

रतीश
1 Apr
Bilaspur

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© Ratish

March 08, 2025

On Women's Day

What can we even say
You enrich our lives everyday
Expectations from you
are unreasonable, unfair
Yet you ace them
everytime with a flair
Don't ever doubt or dispair
It's you who sustain everything everywhere
Ratish
8 Mar 25 

© Ratish

March 02, 2025

Forgive my indescretions

I am inclined yet
reluctant to reach out
To honour your choice
of maintaining distance
and staying away from the crowd
Please forgive my indescretions 
when I seek opportunities 
of throwing pebbles in zest
In a placid lake as a test
To see momentry ripples
That dance uninhibited  
Reminding me of waves
Of a gushing river
You once were
And who now prefers
Her oceanic solitude

2 Mar 25
Ratish
Bilaspur 

© Ratish

February 18, 2025

सुपुर्देखाक

तेरी गली में आए भी 
दीदार भी हुआ 
गोया कुछ ऐसा खो गया
कि कुछ भी नहीं रहा 

इक आखरी दीदार भी
करके आ गए
मिट्टी को सुपुर्देखाक 
करके आ गए

© Ratish
18 Feb 25

February 10, 2025

पूछ मत

तुम्हें क्या मिला मुझे क्या पता
मुझे क्या मिला ये पूछ मत
मैं चिराग सा अब भी जल रहा
तेरी नज़र का असर पूछ मत

© Ratish
10 Feb 25

जाने क्यों दे दिये तुमने

जाने क्यों दे दिये तुमने
अपने कुछ पल
वो हसी, वो यादें
वो बेपरवाह अदाएं
वो‌ बातें, वो नसीहतें
वो अपनेपन का एहसास
जाने क्यों दे दिये तुमने...
इनके लायक मैं कभी था ही नहीं

© Ratish
10 Feb 25

January 22, 2025

Couplets पीछे पड़े सराब के

ख़्वाबों के पर लगे
हमें उड़ाकर ले गए
धरती पे खड़े सोचते
कि वो दिन किधर गए

पीछे पड़े सराब के
अमृत रखे रखे
हाँथों मे रेत पकड़े
धरती पे खड़े खड़े

सराब = mirage

रतीश
22-Jan-25
Bilaspur

© Ratish
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Couplets नुमायाँ

आसां तो नहीं होता है
मुश्किल भी नहीं होता
आंँखों में ख़्वाब का रहना
जो मुकम्मल नहीं होता

जब कुछ नहीं होता है
तब तू ही तो है रहता
लेकिन मेरे वजूद तलक
तू नुमायाँ नहीं होता

नुमायाँ = ज़ाहिर, व्यक्त, प्रत्यक्ष, राज़ खुल जाना

रतीश
21 Jan 25
Bilaspur
© Ratish

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January 21, 2025

Couplets ख़यालात

मेरे ख़यालात सिर्फ सोच है हकीकत तो नहीं
जहाँ कभी कुछ देखा था वहांँ कुछ भी नहीं
थी फिक्र के आसमां न गिरा हो तुम पर
है शुक्र लेकिन कभी ऐसा हुआ ही नहीं

रतीश
Bilaspur
20 Jan 25

© Ratish

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January 19, 2025

Couplets रिश्ते

बचाने के लिए सड़ जाने दें
या बनाने के लिए बिगड़ जाने दें
रिश्ते भी मांगते हैं पोषण तोषण
क्यों इन्हें वक्त के हाथों चढ़ जाने दें

रतीश
19 Jan 25
On train 

© Ratish

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January 14, 2025

Poem मकर संक्रान्ति

मकर संक्रान्ति विषेश 

पतंग, खिचड़ी तिल और गुड़
ओस-शीत मे घिरी थी प्रकृति 
माघ मास का सूर्य मकर में
उत्तरायण प्रवेश की पुनरावृत्ति

रतीश
Pune 
14-Jan-25

© Ratish

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January 12, 2025

Poem: In face of reality

To be abel to feel 
makes you vulnerable again
exposed to raw emotions
of the sufferings and the pain

It also provides a chance 
To reexperience slice of dance
relive moments of your dreams
to amplifiy smiles and screams

It shows you how to perceive
the right from the wrong
the weak from the strong
It defines what really is gold
In face of reality that unfolds

Ratish
Platform 4
Bilaspur
12-Jan-25


© Ratish

January 10, 2025

Poem नूर के भी नूर

तुम्हें सहजता से कह दिया
जो कभी किसी से नहीं कहा
या पर्दा रखा नहीं
या पर्दा रहा नहीं

जो हो गया वो हो गया
कुछ सोच के किया नहीं
इस बात की खुशी नहीं
या कोई गिला नहीं

तू, मैं और लोग सब
इस नूर के भी नूर है
क्यों काल के ग्रास में अब
जीने को मजबूर हैं
 
रतीश
10 Jan 25
बिलासपुर 
© Ratish

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January 09, 2025

Poem निष्ठुर

सर्वस्व पल में देनेवाले
कतरा कतरा देता है क्यूंँ
या मेरा सामर्थ्य कम है
या बड़ा ही निष्ठुर है तू

मैं तुच्छ, अधम ही सही
महाकरुण तेरा स्वभाव है
छोड़ निराधार मुझको
कैसे तू निर्विकार है

करके, ना करके देख लिया
तैर के, बह के देख लिया
नए कर्मफल लगते नहीं सूखे अरण्यों में
सर्वस्व मेरा समर्पित तेरे निष्ठुर चरणों में

रतीश
9 Jan 25
बिलासपुर 

© Ratish


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January 08, 2025

Couplets अहसान कितने

गिन रहा था - हैं तेरे अहसान कितने 
चुन रह था समुद्रांत से पाषाण कितने
बेगैरत होकर जी ली है कितनी सांसें
न जाने रह गए हैं मेरे अरमान कितने

रतीश
8 Jan 25
बिलासपुर 

© Ratish

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January 07, 2025

Couplets दीदार

तेरा दीदार जबसे हो गया है
तेरा दीदार होता जा रहा है
इश्क़ जुनून सा हो गया है
जीव ब्रह्मांड सा हो रहा है

रतीश
7 Jan 25
बिलासपुर

© Ratish

January 06, 2025

Couplets तेरी चाह में

मैं कारवां के कोलाहल में
पूर्णतः गुम था
क्यों खुशबू तेरी कृपा की
मेरी राह से गुजरी

गुजर जाती ये ज़िंदगी
तेरे बिना भी लेकिन
हाय! क्या गुजरी है ये
जो तेरी चाह में गुजरी

रतीश
6 Jan 25
बिलासपुर 
© Ratish

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Couplets

इस वक्त‌ और हालात ने 
ये कैसा दिन दिखाया है 
खुद को भूले जाता हूंँ 
जितना होश आया है

रतीश
6 Jan 25
बिलासपुर

© Ratish


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January 05, 2025

Couplets संजीदा

पहले जो कहते थे बहुत कुछ
अब थोड़े खामोश हो गए हैं
लबों से उनके कैसा शिकवा  
जब वो ही संजीदा हो गए हैं

रतीश
5 Jan 25
बिलासपुर





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© Ratish

January 04, 2025

Couplets

मुद्दतों बाद आज फिर आंँखें नम हैं
शायद कोई ख़याल घर आया होगा
दिल की सूखी पड़ी मिट्टी को
यादों के अब्र ने भिगोया होगा

अब्र=clouds

रतीश
4 Jan 25
बिलासपुर 

© Ratish

January 03, 2025

Hindi Poem जाने कौन है जो मेरे भीतर

यूँ तो कुछ भी नहीं है बदला
लेकिन सब कुछ बदल रहा है
जाने कौन है जो मेरे भीतर 
मेरे ही नाम से रह रहा है

मैं जी रहा हूंँ अपना जीवन
सही ग़लत वो चुन रहा है
जाने कौन है जो मेरे भीतर ...

मैं‌ था कभी कुछ और ही तब
ये कौन मेरे नाम से चल रहा है
यूँ तो कुछ भी नहीं है बदला
लेकिन सब कुछ बदल रहा है

3 Jan 25
रतीश
बिलासपुर

© Ratish

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