जीवन के मधु और कटु
पलों को अधरों से लगा
पी चुका था
गरलामृत का घड़ा
स्वेद रक्त धूल से
कलुषित तन में
हो गया था क्लिष्ट
अंतःकरण मेरा
शीतानिल मेघ-वृष्टि से
जैसे धुलती है धरा
तुम से मिल
सहज मैं हो गया
पलों को अधरों से लगा
पी चुका था
गरलामृत का घड़ा
स्वेद रक्त धूल से
कलुषित तन में
हो गया था क्लिष्ट
अंतःकरण मेरा
शीतानिल मेघ-वृष्टि से
जैसे धुलती है धरा
तुम से मिल
सहज मैं हो गया
25 May

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