May 01, 2025

इस ओर से उस ओर

वक्त की डोर ले चली है
इस ओर से उस ओर
हम भी क्या से क्या हो गए
इस ओर से उस ओर

जाने कब कैसे ऐसे हो गए
रिश्तों से महंगे पैसे हो गए
जाने कब चुन ली हमने खुशी 
की जगह संघर्ष और शोर

तुम भी मुझे थाम तो सकते थे
दो घड़ी आराम के हो सकते थे
है तुम्हारा भी मेरे जैसा ही हाल
अपने अपने चक्रव्यूह का जंजाल

सोचो या कुछ भी नहीं सोचो
करो या कुछ भी नहीं करो
सबसे बिसरेगा ही यह ठौर
जाना है इक छोर से दूजे छोर

फिर भी क्या सोचे जाते हैं
फिर भी क्या करे जाते हैं
जिंदगी को कौड़ियों में लुटाते
गुजरते इस ओर से उस ओर

रतीश
1 May


© Ratish

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