अब तुम मेरे भीतर हो और बाहर भी
ठीक किसी प्रिय स्मरणीय गीत की तरह
बजता है तो बाहर से सुनाई देता है
पढ़ लूं, तो भीतर से सुर-संगीत उभरते हैं
अब तुम मेरे भीतर हो और बाहर भी
ठीक किसी स्वजन मित्र मनमीत की तरह
बाहर हो जब मिलते हो या संवाद होता है
वर्ना भीतर तेरी यादों की जुगाली करता हूंँ
रतीश
21 May
ठीक किसी प्रिय स्मरणीय गीत की तरह
बजता है तो बाहर से सुनाई देता है
पढ़ लूं, तो भीतर से सुर-संगीत उभरते हैं
अब तुम मेरे भीतर हो और बाहर भी
ठीक किसी स्वजन मित्र मनमीत की तरह
बाहर हो जब मिलते हो या संवाद होता है
वर्ना भीतर तेरी यादों की जुगाली करता हूंँ
रतीश
21 May
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