May 21, 2025

अब तुम मेरे भीतर हो और बाहर भी

अब तुम मेरे भीतर हो और बाहर भी
ठीक किसी प्रिय स्मरणीय गीत की तरह
बजता है तो बाहर से सुनाई देता है
पढ़ लूं, तो भीतर से सुर-संगीत उभरते हैं

अब तुम मेरे भीतर हो और बाहर भी
ठीक किसी स्वजन मित्र मनमीत की तरह
बाहर हो जब मिलते हो या संवाद होता है
वर्ना भीतर तेरी यादों की जुगाली करता हूंँ

रतीश
21 May

© Ratish
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