December 28, 2020

Hindi Poem Indrajeet इन्द्रजीत Part 2

इंद्रजीत (भाग २)

Link to first part 

 

आख्यान ने लिया यहाँ विराम 

प्रत्यक्ष शिथिल ह्रदय में जीवंत राम 

इंद्रजीत ने किया दिव्यायुध का संचार 

पराजय भी धर्म हेतु शिरोधार्य 


नियति नियम स्वातन्त्र्य विवेक 

निज जीवन मे रण मे है एक 

मर्यादापुरुषोत्तम रणकर्कश राम 

निस्तेज निष्प्राण निरीह स्वयं पूर्णकाम 

 

हा धिक्! जीवन यह कलंक सम

आक्रोश अधिक और शौर्य कम 

जाने क्या अब करें  उपाय 

रघुकुलदीपक कैसे वापस आए 

 

हनुमंत सुग्रीव अंगद जामवंत 

कर्म भक्ति ज्ञान का भी है अंत

जानकीवल्लभ ही हैं तारणहार

जानकी का श्रद्धा विश्वास अनंत 

 

दूरस्त तार्क्ष्य थे ध्यानमग्न 

फिर नाग बन रहे धर्मविघ्न 

माता की परवशता गत काल

नाग ही थे श्वेताश्व के काले बाल 

 

गरुण पक्षीप्रवर विनतासुत 

इंद्रजयी बल बुद्धि विद्या युक्त 

पौरुष से विजित किया देवामृत 

जननी को करने बन्धमुक्त

 

है  विषम स्तिथि या है स्वांग 

रहें तटस्थ या करें मर्यादा भंग 

नागान्तक ने किया गहन मनन   

हरि स्मरण कर उड़ चले गगन 


महावेग विहगपति व्योममार्ग 

क्षण में ध्वंसित था नागपाश 

रामानुज-राम की विमुक्ति 

गरुड़ बने संभावना से नियति 


मेघनाद सशंक भयाक्रांत

क्यों प्राणान्तक रिक्त प्रहार 

कर्मों से तप क्या हुआ ह्रास 

क्यों  तेजहीन हैं देवास्त्र 

 

शस्त्राभ्यास माया बल 

एक एक कर सब निष्फल 

अमोघास्त्र का नहीं प्रतिकार

कैसे धनुर्धारी कैसे संस्कार

 

सृष्टि का संतुलन नियम

नाग-नागान्तक भी है युग्म

वयं रक्षामः राक्षस संस्कृति 

पतन के ओर पुनरावृत्ति 

 

कैसे कोई नर भालू वानर 

सेना लंका तक ले आये 

क्यों युद्ध की सोची होगी 

जब देव भी हमसे थर्राए 


शिव-पार्वती के संग कैलाश उठाया अपने बाहुबल पर 

क्यों पिनाक पर प्रत्यंचा नहीं चढ़ा पाए उनके सक्षम कर 

सीता का पौरुष से वरण न हुआ जब बीच स्वयंवर 

कैसे बलवश वैदेही को लाये तब निर्जन में छलकर

 

माल्यवान विभीषण कुम्भकर्ण मात 

मंत्रणा नहीं किसी की आत्मसात

राक्षसकुल के अपकर्म संचित 

हव्य शमित धर्मानल भक्षित 


रण में बहे रुधिर स्वेद 

ऐसे में संयम विवेक 

नियति पर छोड़ा निर्णय

शक्तिधर का शक्ति एक्य

 

सीता शक्ति का साक्ष्य प्रमाण 

पुनर्जीवित हुए रघुनाथ राम 

निकुम्बिके! तुमसे मैं रक्षित 

कब तक रहूंगा मैं अविजित

 

स्वातन्त्र्य विवेक नियति नियम 

निज जीवन मे रण मे है सम 

रावनसुत का लंका को प्रण

अंतिम श्वास तक हो दुर्धर रण   

 

© Ratish

Pune Dec 2020

November 21, 2020

Hindi Poem - सांसें आग सी बना लो

बिन कुछ किये भी 

    धूल जमती रहती है 

सासें भी लय के बीच 

     थमती रहती है 

करते हैं हम जो जमा 

    ये कपड़े  लत्ते सब 

बनेंगे ये कूड़ा कर्कट 

    ये पोथी पत्रे  सब 

न जाने कौन कहाँ से

    आया है क्यों हमारे पास 

न जाने कब तक रहेगा 

    ये सब हमारे पास 

हो सके तो भुला दो 

    ये धूल, मिट्टी, मल 

सांसें आग सी बना लो 

    जीवंत, निश्चल, कांत

© Ratish

पूना 

17th Nov 2020

#HindiPoetry #हिंदी #कविता

November 01, 2020

Couplets उसने मुझमें कभी कोई कमीं नहीं देखी

न धुआं देखा है न रौशनी कभी देखी
कैसे रिंद हो जिसनें मयकशी नहीं देखी
ये कैसा इल्म है जो दायरे में ही रखे
किताबी लकीरों ने कभी जिंदगी नहीं देखी

जिसका दीवाना कहलाने का तुझे गुरुर है
जिसकी गुस्ताखी मेंं तुझे कुछ गवारा नहीं
मुझे खुद सा मानता है वो यार मेरा
उसने मुझमें कभी कोई कमीं नहीं देखी

तेरे खयाल, सोहबत और कमी
के बिना धडकनेंं भी बजती नहीं
जाने क्या खलल है मेरी निगाहों मेंं
हर बुत मेंं तेरी रौशनी नहीं देखी

रतीश
पूना
31 Oct 2020

© Ratish

October 24, 2020

Devi Strotra Abhinavagupta देवी स्त्रोत : अभिनवगुप्त तव च काचन न स्तुतिरम्बिके!

देवी स्त्रोत

तव च काचन न स्तुतिरम्बिके!
सकलशब्दमयी किल ते तनुः ।
निखिलमूर्तिषु मे भवदन्वयो
मनसिजासु बहिष्प्रसरासु च ॥

इति विचिन्त्य शिवे शमिताशिवे
जगति जातमयत्नवशादिदम् ।
स्तुतिजपार्चनचिन्तनवर्जिता
न खलु काचन कालकलापि मे ॥

अभिनवगुप्त 

अम्बिके! क्या तुम्हारी स्तुति है और क्या नहीं है? जब तुम निश्चय ही समस्त शब्दों को अपने देह में धारण करने वाली हो  (अर्थात सब कुछ तुम्हारी स्तुति ही है)। सभी भिन्न रूपों में भी आप ही अन्वय रूप से स्थित हैं । मन में स्थित एवं बहार प्रसार करने वाले समस्त विचारों में आप ही हो। 

हे देवी! गहन विचार और उसके निवारण के बाद यह ज्ञात हुआ कि इस जगत की उत्पत्ति अयत्नवश है। क्या आपकी स्तुति, जप, अर्चना एवं चिंतन किये बिना भी मैं हर क्षण निश्चय ही आपकी ही स्तुति में लीन नहीं हूँ?   (अर्थात मेरे समस्त कार्यकलाप तुम्हारी स्तुति ही है)

 Ambike! what is and what is not your praise when all the forms for words surely reside in your universal body. In all the forms I can only see your presence and you are in every resting and wandering thoughts. 

I have deeply contemplated and then concluded that this world is created spontaneously. And without external forms of adulation (  Stuti, Japa, Archana, Chintan) I am constantly immersed in your praise.

Link Below - Explanation by Swami Laxman Joo of the above verse and its transcript

Transcript: https://www.lakshmanjooacademy.org/devi-stotra-by-abhinavagupta/



 

October 04, 2020

Poem स्व स्थित जगत समक्ष

उथले शब्दों के समक्ष

स्थिर हूँ ,मौन हूँ 

 निःशब्द कभी वाचाल 

स्पंद नाद गूँज हूँ 

पांडित्य के लिए 

निज अनुभूति हूँ 

कला काल को लांघती 

रसपूर्ण रीति हूँ 

कर्त्तव्य कार्य सहज दक्ष 

रूचि राग सकल पक्ष 

आनासक्ति भोग सतत सम

 स्व स्थित जगत समक्ष

पूना 

4th October 2020

© Ratish

August 16, 2020

Readings: Siddhartha

The Son Of The Brahman

For whom else were offerings to be made, who else was to be worshipped but Him, the only one, the Atman? 

“Your soul is the whole world”,

“Truly, the name of the Brahman is satyam


With The Samanas

“What is meditation? What is leaving one’s body? What is fasting? What is holding one’s breath? It is fleeing from the self, it is a short escape of the agony of being a self, it is a short numbing of the senses against the pain and the pointlessness of life. 
 
We find comfort, we find numbness, we learn feats, to deceive others. But the most important thing, the path of paths, we will not find.”

It took me a long time and am not finished learning this yet, oh Govinda: that there is nothing to be learned! There is indeed no such thing, so I believe, as what we refer to as ‘learning’. There is, oh my friend, just one knowledge, this is everywhere, this is Atman, this is within me and within you and within every creature. And so I’m starting to believe that this knowledge has no worser enemy than the desire to know it, than learning.” 
 
Gotama

You have found salvation from death. It has come to you in the course of your own search, on your own path, through thoughts, through meditation, through realizations, through enlightenment. It has not come to you by means of teachings! And – thus is my thought, oh exalted one, – nobody will obtain salvation by means of teachings! You will not be able to convey and say to anybody, oh venerable one, in words and through teachings what has happened to you in the hour of enlightenment! 
 
Awakening

I was afraid of myself, I was fleeing from myself! I searched Atman, I searched Brahman, I was willing to dissect my self and peel off all of its layers, to find the core of all peels in its unknown interior, the Atman, life, the divine part,

The purpose and the essential properties were not somewhere behind the things, they were in them, in everything.
 
Kamala

It is true that he had already known for a long time that his self was Atman, in its essence bearing the same eternal characteristics as Brahman. But never, he had really found this self, because he had wanted to capture it in the net of thought. With the body definitely not being the self, and not the spectacle of the senses, so it also was not the thought, not the rational mind, not the learned wisdom, not the learned ability to draw conclusions and to develop previous thoughts in to new ones. 
 
Siddhartha does nothing, he waits, he thinks, he fasts, but he passes through the things of the world like a rock through water, without doing anything, without stirring; he is drawn, he lets himself fall.
 


The Ferryman

Nothing was, nothing will be; everything is, everything has existence and is present.”
 
Om 
 
Slowly blossomed, slowly ripened in Siddhartha the realisation, the knowledge, what wisdom actually was, what the goal of his long search was. It was nothing but a readiness of the soul, an ability, a secret art, to think every moment, while living his life, the thought of oneness, to be able to feel and inhale the oneness. 
 
Govinda

“When someone is searching,” said Siddhartha, “then it might easily happen that the only thing his eyes still see is that what he searches for, that he is unable to find anything, to let anything enter his mind, because he always thinks of nothing but the object of his search, because he has a goal, because he is obsessed by the goal. Searching means: having a goal. But finding means: being free, being open, having no goal.

Knowledge can be conveyed, but not wisdom. It can be found, it can be lived, it is possible to be carried by it, miracles can be performed with it, but it cannot be expressed in words and taught. This was what I, even as a young man, sometimes suspected, what has driven me away from the teachers. I have found a thought, Govinda, which you’ll again regard as a joke or foolishness, but which is my best thought. It says: the opposite of every truth is just as true! That's like this: any truth can be expressed or put into words when it is one-sided. 

Everything is one-sided which can be thought with thoughts and said with words, it’s all one-sided, all just one half, all lacks completeness, roundness, oneness.


August 15, 2020

Readings कामायनी - Jaishankar Prasad

मध्यमा, वैखरी और पश्यंती की प्रतिनिधि भारती, सरस्वती के साथ इड़ा का नाम आया है।

ऋग्वेद में इड़ा को घी, बुद्धि का साधन करने वाली मनुष्य को चेतना प्रदान करने वाली कहा है।

इड़ा देवताओं की स्वसा थी। मनुष्यों को चेतना प्रदान करने वाली थी।

नीचे जल था ऊपर हिम था, एक तरल था एक सघन, एक तत्त्व की ही प्रधानता–कहो उसे जड़ या चेतन।

चिंता करता हूँ मैं जितनी उस अतीत की, उस सुख की, उतनी ही अनंत में बनती जातीं, रेखायें दुख की 

प्रकृति रही दुर्जेय, पराजित हम सब थे भूले मद में, भोले थे, हाँ तिरते केवल सब विलासिता के नद में।

जीवन! जीवन! की पुकार है खेल रहा है शीतल-दाह, किसके चरणों में नत होता नव प्रभात का शुभ उत्साह

पहला संचित अग्नि जल रहा पास मलिन-द्युति रवि-कर से, शक्ति और जागरण-चिह्न-सा लगा धधकने अब फिर से।

पहेली-सा जीवन है व्यस्त, उसे सुलझाने का अभिमान, बताता है विस्मृति का मार्ग चल रहा हूँ बनकर अनजान।

दु:ख के डर से तुम अज्ञात जटिलताओं का कर अनुमान,
काम से झिझक रहे हो आज, भविष्यत् से बनकर अनजान!


जिसे तुम समझे हो अभिशाप, जगत् की ज्वालाओं का मूल, ईश का वह रहस्य वरदान, कभी मत इसको जाओ भूल।

तप नहीं केवल जीवन-सत्य करुण यह क्षणिक दीन अवसाद, तरल आकांक्षा से है भरा–सो रहा आशा का आह्लाद।

एक तुम, यह विस्तृत भू-खंड प्रकृति वैभव से भरा अमंद, कर्म का भोग, भोग का कर्म, यही जड़ का चेतन आनंद।

सौंदर्यमयी चंचल कृतियाँ बनकर रहस्य हैं नाच रहीं, मेरी आँखों को रोक वहीं आगे बढ़ने में जाँच रहीं। मैं देख रहा हूँ जो कुछ भी वह सब क्या छाया उलझन है? सुंदरता के इस परदे में क्या अन्य धरा कोई धन है?

वरदान सदृश हो डाल रही नीली किरणों से बना हुआ, यह अंचल कितना हलका-सा कितने सौरभ से सना हुआ।

छूने में हिचक, देखने में पलकें आँखों पर झुकती हैं, कलरव परिहास भरी गूँजें अधरों तक सहसा रुकती हैं।

उज्ज्वल वरदान चेतना का सौन्दर्य जिसे सब कहते हैं, जिसमें अनन्त अभिलाषा के सपने सब जगते रहते हैं। मैं उसी चपल की धात्री हूँ, गौरव महिमा हूँ सिखलाती, ठोकर जो लगने वाली है उसको धीरे से समझाती।

नारी! तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग पगतल में, पीयूष-स्रोत-सी बहा करो जीवन के सुंदर समतल में।

दुर्व्यवहार एक का कैसे अन्य भूल जावेगा, कौन उपाय ! गरल को कैसे अमृत बना पावेगा !’’


जिसके हृदय सदा समीप है वही दूर जाता है, और क्रोध होता उस पर ही जिससे कुछ नाता है।

ये प्राणी जो बचे हुए हैं इस अचला जगती के, उनके कुछ अधिकार नहीं क्या वे सब ही हैं फीके ?

वर्त्तमान जीवन के सुख से योग जहाँ होता है, छली-अदृश्य अभाव बना क्यों वहीं प्रकट होता है।

औरों को हँसते देखो मनु–हँसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्तृत कर लो सबको सुखी बनाओ !

सुख को सीमित कर अपने में केवल दुख छोड़ोगे, इतर प्राणियों की पीड़ा लख अपना मुँह मोड़ोगे,

जीवन का उद्देश्य, लक्ष्य की प्रगति दिशा को पल में, अपने एक मधुर इंगित से बदल सके जो छल में।


अपनी रक्षा करने में जो चल जाय तुम्हारा कहीं अस्त्र, वह तो कुछ समझ सकी हूँ मैं–हिंसक से रक्षा करे शस्त्र।

यह द्वैत, अरे यह द्विविधा तो है प्रेम बाँटने का प्रकार ! भिक्षुक मैं ! ना, यह कभी नहीं–मैं लौटा लूँगा निज विचार।

तुम अपने सुख से सुखी रहो मुझको दुख पाने दो स्वतंत्र, ‘मन की परवशता महा-दुख’ मैं यही जपूँगा महामंत्र !

तुम भूल गए पुरुषत्व-मोह में कुछ सत्ता है नारी की समरसता है संबंध बनी अधिकार और अधिकारी की 

सौंदर्य जलधि से भर लाये केवल तुम अपना गरल पात्र तुम अति अबोध, अपनी अपूर्णता को न स्वयं तुम समझ सके परिणय जिसको पूरा करता उससे तुम अपने आप रुके

‘कुछ मेरा हो’ यह राग-भाव संकुचित पूर्णता है अजान मानस-जलनिधि का क्षुद्र-यान।

कोलाहल कलह अनंत चले, एकता नष्ट हो, बढ़े भेद अभिलषित वस्तु तो दूर रहे, हाँ मिले अनिच्छित दुखद खेद


सब कुछ भी हो यदि पास भरा पर दूर रहेगी सदा तुष्टि दुख देगी यह संकुचित दृष्टि।

मस्तिष्क हृदय के हो विरुद्ध, दोनों में हो सद्‌भाव नहीं वह चलने को जब कहे कहीं तब हृदय विकल चल जाए कहीं

जीवन को बाधा-मय पथ पर ले चले मेद से भरी भक्ति या कभी अपूर्ण अहंता में हो रागमयी-सी महाशक्ति व्यापकता नियति-प्रेरणा बन अपनी सीमा में रहे बंद सर्वज्ञ-ज्ञान का क्षुद्र-अंश विद्या बनकर कुछ रचे छंद

कत्तृर्त्व-सकल बनकर आये नश्वर-छाया-सी ललित-कला नित्यता विभाजित हो पल-पल में काल निरंतर चले ढला तुम समझ न सको, बुराई से शुभ-इच्छा की है बड़ी शक्ति हो विफल तर्क से भरी युक्ति।

जीवन सारा बन जाय युद्ध उस रक्त, अग्नि की वर्षा में बह जायँ सभी जो भाव शुद्ध अपनी शंकाओं से व्याकुल तुम अपने ही होकर विरुद्ध अपने को आवृत किये रहो दिखलाओ निज कृत्रिम स्वरूप वसुधा के समतल पर उन्नत चलता फिरता हो दंभ-स्तूप

तुम जरा मरण में चिर अशांत जिसको अब तक समझे थे सब जीवन में परिवर्तन अनंत अमरत्व वही अब भूलेगा तुम व्याकुल उसको कहो अंत

हाँ तुम ही हो अपने सहाय जो बुद्धि कहे उनको न मान कर फिर किसकी नर शरण जाय जितने विचार संस्कार रहे उनका न दूसरा है उपाय

सब अतीत में लीन हो चलीं, आशा, मधु-अभिलाषाएँ, प्रिय की निष्ठुर विजय हुई, पर यह तो मेरी हार नहीं !

जो मेरी है सृष्टि उसी से भीत रहूँ मैं, क्या अधिकार नहीं कि कभी अविनीत रहूँ मैं ?

विश्व एक बंधन विहीन परिवर्तन तो है, इसकी गति में रवि-शशि-तारे ये सब जो हैं।


यह नर्त्तन उन्मुक्त विश्व का स्पंदन द्रुततर, गतिमय होता चला जा रहा अपने लय पर।
कभी-कभी हम वही देखते पुनरावर्त्तन, उसे मानते नियम चल रहा जिससे जीवन।

जीवन में अभिशाप शाप में ताप भरा है, इस विनाश में सृष्टि-कुंज हो रहा हरा है।

आह प्रजापति यह न हुआ है, कभी न होगा, निर्वाधित अधिकार आज तक किसने भोगा ?’’ यह मनुष्य आकार चेतना का है विकसित, एक विश्व अपने आवरणों में है निर्मित ! चिति-केंद्रों में जो संघर्ष चला करता है, द्वयता का जो भाव सदा मन में भरता है।

व्यक्ति चेतना इसीलिए परतंत्र बनी-सी, रागपूर्ण, पर द्वेष-पंक में सतत सनी-सी।

यह जीवन उपयोग, यही है बुद्धि- साधना, अपना जिसमें श्रेय यही सुख की अराधना। लोक सुखी हो आश्रय ले यदि उस छाया में, प्राण सदृश तो रमो राष्ट्र की इस काया में। 


देश कल्पना काल परिधि में होती लय है, काल खोजता महाचेतना में निज क्षय है।

वह अनंत चेतन नचता है उन्मद गति से, तुम भी नाचो अपनी द्वयता में–विस्मृति में।


ताल-ताल पर चलो नहीं लय छूटे जिसमें, तुम न विवादी स्वर छेड़ो अनजाने इसमें।’’


किंतु आज अपराध हमारा अलग खड़ा है, हाँ में हाँ न मिलाऊँ तो अपराध बड़ा है।

बाधाओं का अतिक्रमण कर जो अबाध हो दौड़ चले, वही स्नेह अपराध हो उठा जो अब सीमा तोड़ चले।

अपना हो या औरों का सुख बढ़ा कि बस दुख बना वही, कौन बिंदु है रुक जाने का यह जैसे कुछ ज्ञात नहीं।

तुमने हँस-हँस मुझे सिखाया विश्व खेल है खेल चलो, तुमने मिलकर मुझे बताया सबसे करते मेल चलो।


अंध-तमस् है, किंतु प्रकृति का आकर्षण है खींच रहा, सब पर, हाँ अपने पर भी मैं झुँझलाता हूँ खीझ रहा।

नहीं पा सका हूँ मैं जैसे जो तुम देना चाह रही, क्षुद्र पात्र ! तुम उसमें कितनी मधु-धारा हो ढाल रही।

सब बाहर होता जाता है स्वगत उसे मैं कर न सका, बुद्धि-तर्क के छिद्र हुए थे हृदय हमारा भर न सका।

श्रम- भाग वर्ग बन गया जिन्हें, अपने बल का है गर्व उन्हें; नियमों की करनी सृष्टि जिन्हें, विप्लव की करनी 

चिति का स्वरूप यह नित्य-जगत, वह रूप बदलता है शत-शत; कण विरह-मिलन-मय नृत्य-निरत, उल्लासपूर्ण आनंद सतत; तल्लीन, पूर्ण है एक राग, झंकृत है केवल ‘जाग जाग !’’

लघुता मत देखो वक्ष चीर, जिसमें अनुशय बन घुसा तीर।’’

यह जीवन की मध्य-भूमि है रस-धारा से सिंचित होती, मधुर लालसा की लहरों से यह प्रवाहिका स्पंदित होती।


चिर-वसंत का यह उद्गम है पतझर होता एक ओर है, अमृत हलाहल यहाँ मिले हैं सुख-दुख बँधते, एक डोर हैं

श्रममय कोलाहल, पीड़नमय विकल प्रवर्त्तन महायंत्र का, क्षण भर भी विश्राम नहीं है प्राण दास है क्रिया-तंत्र का।

हम अन्य न और कुटुंबी हम केवल एक हमीं हैं, तुम सब मेरे अवयव हो जिसमें कुछ नहीं कमी है। 

© Ratish


August 02, 2020

Readings - Bkatanam hrydayam madiya harydayam - भक्तानां हृदयं मदीय हृदयं

I came across these beautiful verse extract in my old notebook. Source not mentioned. If anyone is familiar with the text please let me know I would love to read the rest of composition.

भक्तानां हृदयं मदीय हृदयं रूपं तदीयं मम
तत्कर्मैव ममास्ति कर्म निखिलं व्यक्तःएवास्महं
किं भेदं परिकल्प्य खिद्यासि मुहुर्ध्वस्तेपि भेदे मया
शक्तिर्मेस्ति समस्त वैभववती या राजते त्वयिSपि
 
भक्तों का हृदय ही मेरा हृदय है।  उनका जो रूप है वही मेरा है। भक्तों की सभी कर्म व्यक्त रूप में मेरी ही क्रियाएं हैं।  मैंने तुम्हारे साथ भेद को धवस्त (छोड़) कर दिया है फिर तुम भेद की कल्पना कर के बार बार क्यों खेद कर रहे हो?  मेरी समस्त वैभवशाली शक्तियाँ तुममें भी प्रस्फुरित हैं।

The essence (core/heart) of my believers is my essence. Their form is my form. Whatever acts they perform are my actions in visible from. I have demolished all the differences between us then why you are distressing yourself by assuming this imaginary difference? All my glorious energies are vibrating in you as well. 

Agama #KashmirShaivism #pratyabhijna #Trika #vedanta #Sanskrit #Shloka #advaita  #NonDual #Shiva #Shakti #Guru #Philosophy #Spiritual #ShivaYogi

July 26, 2020

Readings: Vigyan Bhairava विज्ञान भैरव verses 1-13 summary


Vigyan here implies experiential knowledge, pure consciousness, awareness rather than analytical knowledge.



Nature of Bhairava 
 I am manifesting the universe in the space of my own consciousness, I am the creator, being of the nature of everything. Abhinavagupta (Tantraloka III.283-285)

Bhairava (भैरव) is of the nature of pure I-consciousness (अहं ) which is therefore resounding in every conscious being. He pervades, sustains and absorbs the universe. He liberates beings from the fear (भय = fear ) of samsara and he illumines everything with his ligth (भा = very bright light). By becoming becoming one with non-dual I-consciousness one can attain the Bhairava nature (Tantraloka II.283)



After previously listening to the Trika / Trantra completely as explained by Shiva (Bhairava) Parvati (Bhairavi) had few doubts that she wants to be clarified (1-7)
  • What is essence of reality (तत्वतो)
  • What is form of energy (शक्तिस्वरुपकम्)
    • चक्रारूढमनच्कं = in vibration (स्पन्द) or without movement (अस्पन्द) or appearance of no movement when in motion and vice versa
  • Can the Sakala form (सकल रूप) of energy states be same Lower (अपरा ) medium (परापरा ) and supreme (परा)

Sakala (सकल) -  Where there is any sensation of space, time or formKalna means that which can be perceived, that which can be heard, that which can be seen that which can be touched. 

Bhairava is pleased to response and state 8-9
All the different paths and ways expounded in texts are useless and like delusion. It is maya, like dream or  castles in air (गन्धर्वनगरभ्रमं)

ध्यानार्थं भ्रांतबुद्धिनां क्रियाडम्बरवर्तिनाम।
केवलं वर्णितं पुंसां विकल्पनिहितात्मनां ।।10

The various ways (in Tantra) are are only described for people who are indecisive/doubtful (विकल्प). .  These people are not steadfast mind (भ्रांतबुद्धिनां) and take pleasure in performing superfluous actions (क्रियाडम्बर).

Bhairava in next few verses (11-13) goes on to refute all the doubts (this or that type of queries) and states that the ways established in Tantras are like diverting ignorant boys from bad actions (बालविभीषिकाः).

#Vigyan #Bhairava #विज्ञान #भैरव #Agama #KashmirShaivism #pratyabhijna #Trika #vedanta #Sanskrit #Shloka #advaita  #NonDual #Shiva #Shakti #Guru #Philosophy #Spiritual #ShivaYogi

July 18, 2020

Couplets: Hindi Haden हदें

बदं होकर अंदर कुछ और खुल गया हूँ
हदें थीं जो वो सब भी मैं अब भूल रहा हूँ

                                                रतीश



© Ratish
Pune 2020 July 18th

July 11, 2020

Readings: Ishvara Pratyabhijna Vivriti Vimarshini ईश्वरप्रत्यभिज्ञा विवृति विमर्शिनी

अभिनवगुप्त
Abhinavgupta
Versers from the preface of Isvara Pratyabijna commented by polymath Abhinvagupta. He was a Shiva Yogi who created new paths unified and expounded on existing texts/thoughts by commenting on them. He was steadfastly stead on supreme consciousness from where he left his brilliance in all areas he chose to indulge in. He remains to day one of the tallest/brightest beacons that guide and inspire us to this day. Abhinavgupta experienced everything from shiva dristi and for him rasa, bhoga and moksha were  waves of the same tide. 



#Agama #KashmirShaivism #pratyabhijna #Trika #vedanta #Sanskrit #Shloka #advaita  #NonDual #Shiva #Shakti #Guru #Philosophy #Spiritual #ShivaYogi

June 28, 2020

Readings - Sanskrit AbhinavGupta






रसः - अनन्दरुपास्वादनक्रिया

आनंदघनमास्वाद्यते 



National WebinarAbhnavguptacharya Jayanti

https://www.facebook.com/108921704126272/videos/390209168603657/?v=390209168603657

June 21, 2020

Reading - #Sanskrit दधि मधुरं मधु मधुरं

दधि मधुरं मधु मधुरं

द्राक्षा मधुरा सुधापि मधुरैव 

तस्य तदेव हि मधुरं

यस्य मनो यत्र संलग्नम

#Subhashita #Sukit

Reading #Sanskrit #Bhairav वारणस्याम भैरवो देवः

वारणस्याम भैरवो देवः
संसर भय नाशनम्
अनेक जन्म कृतस्पापं
स्मरणेन विनष्यति

#Shloka #Bhairav #Varanasi #Sanskrit

Readings #Sanskrit #अथर्ववेद - विश्वम्भर विश्वेन मा भरसा पाहि स्वाहा


विश्वम्भर विश्वेन मा भरसा पाहि स्वाहा ॥५॥

अथर्ववेदः/काण्डं २/सूक्तम् १६
(२,१६.५ )

हे सर्व पोषक परमेश्वर! (विश्वेन ) सब (भरसा) पोषण शक्ति से  (मा ) मेरी (पाहि) रक्षा कर यह सुन्दर आर्शीवाद हो।


#अथर्ववेद

May 17, 2020

Readings Sanskrit - Navarna Mantra नवार्ण मंत्र

वाङ्मया ब्रह्मभूतस्मात्षष्ठं वक्त्रसमन्वितम् ।
सूर्यो वामश्रोत्रबिन्दुः संयुताष्टकतृतीयकः ॥ १३॥


 नारायणेन संयुक्तो वायुश्चाधरसंयुतः ।
 विच्चे नवार्णकोऽर्णः स्यान्महदानन्ददायकः ॥ १४॥

देव्युपनिषद् 



ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे

 

#sanskrit #Navarna #Mantra #Devi #Upnishad

May 01, 2020

Reading Sanskrit भीतिर्नास्ति भुजंग


Various common symbolism are used for Shiva higher state our our consciousness.

भीतिर्नास्ति भुजङ्गपुङ्गवविषात्प्रीतिर्न चन्द्रामृता-
न्नाशौचं हि  कपालदामलुलनात्शौचं न गङ्गाजलात्।
नोद्वेगश्चितभस्मना न च सुखं गौरीस्तनालिङ्गना-
दात्मारामतया हिताहितसमः स्वस्थो हरः पातु वः॥


He has no fear (भीति) of the most venomous snakes (on his body), nor special attachment (प्रीति) towards moon that gives out nectar (residing in his tresses); 
He does not become impure (अशौचं )  because of dangling skull (कपाल) garland (दाम) (around neck), nor does he becomes purified (शौचं) by being washed by waters of  Ganga (entrapped and dripping from his matted hair); 
He is not agitated (उद्वेग) by ash of funeral pyre that is smeared on body (indication mortal part of  body), nor has he any pleasure (सुख) by intimate embrace with Gauri (his consort Shakti शक्ति ) .

As he is self absorbed (आत्म रमण  ) and tranquil (समः)  hence not affected by anything that is beneficial (हित)  nor anything that is detrimental (अहित) to him (Shiva is beyond duality of this world).
May that Shiva (हरः) who resides in self (स्वस्थः)  protect (पातुः) us. (May we become one with this form)



#Shiva #Stuti #Sanskrit #Shloka

April 30, 2020

Hindi Poem जीवन है एक मादक मदिरा

आवाज़ों को तरसोगे तुम
चेहरा चेहरा ढूँढ़ोगे
जाने कौन नज़र आएगा
जब भी आंखें मूँदोगे

बीते मदहोशी की यादें 
यहाँ न कोई बाकी है 
न गुजरे पीनेवाले हैं
न पैमाने न साकी है

आज हो तुम जिनके संग
लम्हा लम्हा जी लो
जीवन है एक मादक मदिरा
मिल बाँट पी लो


रतीश
Pune

April 30 2020

April 28, 2020

Couplets पल सोहबत के

रिस के आती है जितनी
तेरी रौशनी मुझे काफ़ी है
पल सोहबत के कम ही सही
ऐसी जिंदगी मुझे काफ़ी है






















रतीश
Pune
April 28 2020

April 27, 2020

Couplets तेरे ये रहम


मुझपे तेरे ये रहम हैं तो हैं
आश्ना तेरे हम हैं तो हैं
एक तेरे नूर को छोड़कर
सारा आलम ये भरम है तो है



 











रतीश
Pune
April 27 2020

April 26, 2020

Couplets इल्म की राह

इल्म की राह है आसान इतनी
चलने वाला कहीं दूर चला जाता है
रुक गया कोई इस लम्हे में कभी
तुझसा होकर दीदार वही पाता है













रतीश
Pune
April 26 2020

Couplets जिल्द


तेरे बिन बेवजह कुछ इस तरह हूँ मैं
जैसे हो जिल्द कोई बिन किताबों के












रतीश
Pune
April 26 2020

April 25, 2020

Couplets मौज में रहते हैं

मौज में रहते हैं मौजों से हमें प्यार भी है
पानी में रहके हम उसके तलबगार भी हैं























रतीश
Pune
April 25 2020

Couplets बेनज़ीर

खुद की नज़र में अब भी मैं बेनज़ीर हूँ
तेरी से गिर गया हूँ शायद फक़ीर हूँ

रतीश
Pune
April 25 2020

Couplets इस नज़र के


इस नज़र के भी जाने कैसे ये करिश्मे हैं
देखना चाहूँ जो बस वो ही दिखाई दे है 





















रतीश
Pune
25 April 2020


April 24, 2020

couplets बिसात


खेल चल रहा है ये बिसात रख़ी है
सामने तेरे पूरी ये कायनात रख़ी है















रतीश
Pune
24  April 2020

April 23, 2020

Couplets अक्स



तेरे वजूद की झलक भी तेरी इनायत है 

वगर्ना तेरे अक्स से भी कोई राबता नहीं 





















रतीश
Pune
23 April 2020

April 22, 2020

Hindi Poem दरख़्त


ये दरख़्त है  इन दरख़्तों का क्या है
जहाँ पर ऊगे थे वहीं सारा जहाँ है


नीचे इनके ज़मीं है ऊपर आसमां है
मिलता सभी को इनसे आसरा है

हम ख़ानाबदोश ढूंढते जाने क्या है
न खुद की जड़े हैं न खुद का पता है























रतीश
Pune
22 April 2020

April 21, 2020

Couplets इंसा भी आदतन


पत्तों की तरह इंसा भी आदतन
रंग बदलते हैं और गिर जाते हैं






















रतीश
Pune
21 April 2020

Couplets न जाने मैं भी ये क्या पी रहा था

सामने क्या था
क्या दिख रहा था
न जाने मैं भी ये
क्या पी रहा था





रतीश
Pune
21 April 2020

April 20, 2020

Hindi Poem रेत पर ऊंगलियों से

ये खण्डहर भी महल थे शहर थे
यहाँ हाट लगते थे लोगों के घर थे
उन लोगों की थी जिंदगानी थी कहानी
यहाँ बस यही हैं ना है उनकी निशानी

हमारी जिंदगी के ये सारे किस्से 

लिखे जैसे रेत पर ऊंगलिओं से















रतीश
Pune
20 April 2020

Hindi Poem लोहे की एक बैंच


इस राह पर कभी निकलता हूँ
अब भी ख़यालों में
कुछ दूर लोहे की एक बैंच है
काई जमी रहती है वहाँ
आँखे मूंदे बैठे उस पर 
ना जाने कितनी और
राहों पर निकल जाता हूँ



























रतीश
Pune
19 April 2020

April 19, 2020

Couplets तेज़ जितना जाओगे

तेज़ जितना जाओगे धुंधला लगेगा उतना सफर
हर लम्हे में ठहरकर जिंदगी अपनी सँवार लो

रतीश
Pune

19 April 2020

Couplets क्यों कहते फ़िरे इस आसमां को आसमां

यूं ही क्यों कहते फ़िरे इस आसमां को आसमां
इस से ज्यादा बुलंद तो मेरी चाह प्रति क्षण में है

© Ratish

19 April 2020
Pune

Couplets मेरे सामने मेरा यार था

आप ही बज उठा
खींचा हुआ सा तार था
होश में कैसे रहें
मेरे सामने मेरा यार था 







© Ratish
19 April 2020
Pune

April 18, 2020

Couplets फिर नया सा प्यार दो


जो कभी किसी से कहा नहीं
उसे कागजों पर उभार दो

ये जख्म है बड़े कीमती
इन्हे फिर नया सा प्यार दो



© Ratish
Pune
18 April 2020

Couplets बस तू ही दिखाई दे है

एक दौर वो भी था
जब खोजते थे तेरे निशान
एक लम्हा ये भी है
बस तू ही दिखाई दे है

© Ratish
Pune
18 April 2020

April 16, 2020

Hindi Poem Indrajeet इन्द्रजीत

I had started writing on Indrajeet as one of the pre-eminent warrior who was both highly skilled and had an advantage of being a mayavi which he used to vanquish enemies in any warfare.
In the current context we are only left with people who spread misinformation and are full of deceit. And they use what ever means possible towards their end.

इन्द्रजीत

अस्त्र शास्त्र थे सुसज्जित यज्ञशाल में
लपटें लील लेती थी आहुतियाँ भी थाल से
अपराजेय इंद्रजीत अर्चि सा धधक रहा
जो क्रुद्ध हो बरसने शत्रुदल तृण विशाल में

रक्षासश्रेष्ठ युवराज युद्धकौशल दक्ष था
विजय थी वहीं रावणि जिस पक्ष था
पितृव्य, भ्राता, परिजन काल के ग्रास थे
रावणसुत स्वयं काल सा काल के समक्ष था

दिव्यायुध अर्जित किये तपोबल ज्ञान से
माया के संचार में विश्वजीतअप्रतिम था
जय सर्वोपरि थी न कोई नियम मान्य था
सत्य से भी बड़ा राक्षसकुल का सम्मान था

पूर्णाहुति के पर्यंत वटवृक्ष पर दी बली
अभिमंत्रित किये रथ, शस्त्र और सारथी
रणकर्कश रावणि रथारूढ़ नभपथ उड़ा 
हर्षित राक्षस सेना सिंहनाद करते चली

व्योम से दारुण बाण वृष्टि थी निरंतर
मर्कट वीर हत क्षत गिरे समरभूमि पर 
वानरयूथपति अदृश्य शत्रु वार से थे विकल
त्राहि माम महाविराव गूंजा हर ओर स्वर

वानरसेना विध्वंस करता  मेघनाद बढ़ा द्रुतगति 
भ्रम और संहार शक्ति से परिपूर्ण वह अतिरथी
राम-लक्ष्मण मूर्छित किये अभिमंत्रित प्रहार से
हर्षित देवशत्रुवाहिनी लंकावृत्ति - जयति रावणि!

रणश्रेष्ठ दशरथनन्दनों को अचेत देख कर
स्तब्ध-निराश्ररित था मर्केट भालूक शिविर
युद्ध में रघुकुल सूर्य शौर्य था ढक गया
मायावी इंद्रजीत था तमोमय सलीलधर 

विस्मय ! अगणित क्षत विक्षत वीर शांत
विस्मय !  विजित पाषण तारक रमाकांत
विस्मय ! स्वयं शेष सौमित्र बंधे नागपाश
अहो ! कराल समर का हो रहा अनिष्टांत

Link to Part 2 of the Poem

© Ratish
Pune
16 April 2020

#Indrajeet #Meghnad #Ravani #Vishwajeet
#इन्द्रजीत    #मेघनाद    #रावणि #विश्वजीत

Couplets: देख कर तुझको बचपन याद आता है

देख कर तुझको बचपन याद आता है
वो सादगी वो भोलापन याद आता है
याद आती है वो बेफिक्री वो बेपरवाही
और अपनों का अपनापन याद आता है

© Ratish
Pune
16 April 2020

April 15, 2020

Couplets मेरे रक़ीब


मेरे रक़ीब चल साथ बैठ कर पीते हैं
तेरे दीदार से मुझको वो याद आता है


© Ratish
15 April 2020
Pune

April 14, 2020

Couplets मैं भी कभी मैं था

तुझको देखता हूँ तो खुदा याद आता है
मैं भी कभी मैं था ये याद आता है

© Ratish
14 April 2020
Pune

Couplets देखा है तुझमें क्या-क्या

मेरी नज़रों ने बना दिया तुझकोअधिक हसीं
ये चाहत, ये कशिश, ये दीवानगी आसां तो नहीं
देखा है तुझमें क्या-क्या कैसे मैं  क्या ये कहूँ
है मय, है जाम, है नशा है, तू है मेरी ज़िन्दगी


© Ratish
14 April 2020
Pune

Couplets थोड़ा दरिया सा फिर बनाओ मुझे

लहरों अब आ कर डुबाओ मुझे
थोड़ा दरिया सा फिर बनाओ मुझे
सूखा पड़ा हूँ रेत सा साहिल पर
आगोश में लेकर हदें फिर भुलाओ मुझे

© Ratish
14 April 2020
Pune


April 13, 2020

Couplets तेरा करम तेरा रहम

जो कभी दो जहां था चाहता
मांगे आज वह पोहा चाय
तेरा करम तेरा रहम
वो भी मिला ये भी पाए


© Ratish
13th April 2020
Pune

April 12, 2020

Reflections



Two score and three years ago I came into being. The scale of time extends to infinity in both directions. We all have a finite time here to live, contribute and prosper. The current situation only accentuates further the fragility of our lives. 

Looking back on my journey one constant that I find is an aspiration to learn and understand. I can come to terms with a thought that I do not have the answers. What I find harder is to give up the quest to understand and live a more meaningful life. 

 This quest has taken me across oceans, changed the direction of my life innumerable times. Led me to commit some atrocious mistakes and errors of judgement. I have fallen flat on my face. I have also received help and support for which I was not worthy. I have been fortunate to be among friends no matter where I was, 

 In this moment of reflection I would like to share a few themes that have guided me
  1. Dream Big
  2. Make it real 
  3. When you get there there is no there there
  4. Enjoy the moment and the process
  5. Leave things better than you found them
Let me also take this opportunity to thank you all for being part of my life and enriching it with your presence.
  
© Ratish
12 Apr 2020
Pune

Readings: Sanskrit Vyasa - Remain unaffected by the miseries of this world

जिस प्रकार पर्वत के शिखर से नीचे की सभी भूमि समतल प्रतीत होती है उसी प्रकार बोध के भाव में स्थित व्यक्ति के  लिए दुःख (परिकूल स्थिति) भी संताप का कारण नहीं बनती।

All the low lying regions is perceived to be flat while observing from the peaks of mountain,  in the same way for people who embody wisdom remain unaffected by the miseries of this world.

#Vyasa #Sanskrit  #equanimity #wisdom

April 11, 2020

Photos 1


Hindi Poem - एक बारगी फिर सोच लो


एक बारगी फिर सोच लो 


कभी ऑंखें मूँद कर बैठना
कहीं चाय पर वो गुफ़्तगू
लिख़ लेना जो अच्छा हो पढ़ा
हांथों से अपने हूबहू

ये आज कल जो मंडी है
बिकता है हीरा कोयले की तरह
ये मंज़र, ये लोग, ये लम्हे भूल कर
क्या ढूँढ़ते हैं हम दरबदर

एक बारगी फिर सोच लो 
जिसकी तुम्हें दरकार  है
तुम नूर हो इस जहान के
कहीं सीमित तो नहीं विचार हैं




© Ratish
11 April 2020
Pune

February 23, 2020

Readings: Valmiki Ramayana - First Shloka वाल्मीकि रामायण मा निषाद

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः ।
यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी काममोहितम् ।।

वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, द्वितीय सर्ग, श्लोक 15
निषाद, त्वम् शाश्वतीः समाः प्रतिष्ठां मा अगमः, यत् (त्वम्) क्रौंच-मिथुनात् एकम् काम-मोहितम् अवधीः ।



 #Ramayana #Valmiki #वाल्मीकि #रामायण
© Ratish