एक बारगी फिर सोच लो
कभी ऑंखें मूँद कर बैठना
कहीं चाय पर वो गुफ़्तगू
लिख़ लेना जो अच्छा हो पढ़ा
हांथों से अपने हूबहू
ये आज कल जो मंडी है
बिकता है हीरा कोयले की तरह
ये मंज़र, ये लोग, ये लम्हे भूल कर
क्या ढूँढ़ते हैं हम दरबदर
एक बारगी फिर सोच लो
जिसकी तुम्हें दरकार है
तुम नूर हो इस जहान के
कहीं सीमित तो नहीं विचार हैं
© Ratish
11 April 2020
Pune
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