August 15, 2020

Readings कामायनी - Jaishankar Prasad

मध्यमा, वैखरी और पश्यंती की प्रतिनिधि भारती, सरस्वती के साथ इड़ा का नाम आया है।

ऋग्वेद में इड़ा को घी, बुद्धि का साधन करने वाली मनुष्य को चेतना प्रदान करने वाली कहा है।

इड़ा देवताओं की स्वसा थी। मनुष्यों को चेतना प्रदान करने वाली थी।

नीचे जल था ऊपर हिम था, एक तरल था एक सघन, एक तत्त्व की ही प्रधानता–कहो उसे जड़ या चेतन।

चिंता करता हूँ मैं जितनी उस अतीत की, उस सुख की, उतनी ही अनंत में बनती जातीं, रेखायें दुख की 

प्रकृति रही दुर्जेय, पराजित हम सब थे भूले मद में, भोले थे, हाँ तिरते केवल सब विलासिता के नद में।

जीवन! जीवन! की पुकार है खेल रहा है शीतल-दाह, किसके चरणों में नत होता नव प्रभात का शुभ उत्साह

पहला संचित अग्नि जल रहा पास मलिन-द्युति रवि-कर से, शक्ति और जागरण-चिह्न-सा लगा धधकने अब फिर से।

पहेली-सा जीवन है व्यस्त, उसे सुलझाने का अभिमान, बताता है विस्मृति का मार्ग चल रहा हूँ बनकर अनजान।

दु:ख के डर से तुम अज्ञात जटिलताओं का कर अनुमान,
काम से झिझक रहे हो आज, भविष्यत् से बनकर अनजान!


जिसे तुम समझे हो अभिशाप, जगत् की ज्वालाओं का मूल, ईश का वह रहस्य वरदान, कभी मत इसको जाओ भूल।

तप नहीं केवल जीवन-सत्य करुण यह क्षणिक दीन अवसाद, तरल आकांक्षा से है भरा–सो रहा आशा का आह्लाद।

एक तुम, यह विस्तृत भू-खंड प्रकृति वैभव से भरा अमंद, कर्म का भोग, भोग का कर्म, यही जड़ का चेतन आनंद।

सौंदर्यमयी चंचल कृतियाँ बनकर रहस्य हैं नाच रहीं, मेरी आँखों को रोक वहीं आगे बढ़ने में जाँच रहीं। मैं देख रहा हूँ जो कुछ भी वह सब क्या छाया उलझन है? सुंदरता के इस परदे में क्या अन्य धरा कोई धन है?

वरदान सदृश हो डाल रही नीली किरणों से बना हुआ, यह अंचल कितना हलका-सा कितने सौरभ से सना हुआ।

छूने में हिचक, देखने में पलकें आँखों पर झुकती हैं, कलरव परिहास भरी गूँजें अधरों तक सहसा रुकती हैं।

उज्ज्वल वरदान चेतना का सौन्दर्य जिसे सब कहते हैं, जिसमें अनन्त अभिलाषा के सपने सब जगते रहते हैं। मैं उसी चपल की धात्री हूँ, गौरव महिमा हूँ सिखलाती, ठोकर जो लगने वाली है उसको धीरे से समझाती।

नारी! तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग पगतल में, पीयूष-स्रोत-सी बहा करो जीवन के सुंदर समतल में।

दुर्व्यवहार एक का कैसे अन्य भूल जावेगा, कौन उपाय ! गरल को कैसे अमृत बना पावेगा !’’


जिसके हृदय सदा समीप है वही दूर जाता है, और क्रोध होता उस पर ही जिससे कुछ नाता है।

ये प्राणी जो बचे हुए हैं इस अचला जगती के, उनके कुछ अधिकार नहीं क्या वे सब ही हैं फीके ?

वर्त्तमान जीवन के सुख से योग जहाँ होता है, छली-अदृश्य अभाव बना क्यों वहीं प्रकट होता है।

औरों को हँसते देखो मनु–हँसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्तृत कर लो सबको सुखी बनाओ !

सुख को सीमित कर अपने में केवल दुख छोड़ोगे, इतर प्राणियों की पीड़ा लख अपना मुँह मोड़ोगे,

जीवन का उद्देश्य, लक्ष्य की प्रगति दिशा को पल में, अपने एक मधुर इंगित से बदल सके जो छल में।


अपनी रक्षा करने में जो चल जाय तुम्हारा कहीं अस्त्र, वह तो कुछ समझ सकी हूँ मैं–हिंसक से रक्षा करे शस्त्र।

यह द्वैत, अरे यह द्विविधा तो है प्रेम बाँटने का प्रकार ! भिक्षुक मैं ! ना, यह कभी नहीं–मैं लौटा लूँगा निज विचार।

तुम अपने सुख से सुखी रहो मुझको दुख पाने दो स्वतंत्र, ‘मन की परवशता महा-दुख’ मैं यही जपूँगा महामंत्र !

तुम भूल गए पुरुषत्व-मोह में कुछ सत्ता है नारी की समरसता है संबंध बनी अधिकार और अधिकारी की 

सौंदर्य जलधि से भर लाये केवल तुम अपना गरल पात्र तुम अति अबोध, अपनी अपूर्णता को न स्वयं तुम समझ सके परिणय जिसको पूरा करता उससे तुम अपने आप रुके

‘कुछ मेरा हो’ यह राग-भाव संकुचित पूर्णता है अजान मानस-जलनिधि का क्षुद्र-यान।

कोलाहल कलह अनंत चले, एकता नष्ट हो, बढ़े भेद अभिलषित वस्तु तो दूर रहे, हाँ मिले अनिच्छित दुखद खेद


सब कुछ भी हो यदि पास भरा पर दूर रहेगी सदा तुष्टि दुख देगी यह संकुचित दृष्टि।

मस्तिष्क हृदय के हो विरुद्ध, दोनों में हो सद्‌भाव नहीं वह चलने को जब कहे कहीं तब हृदय विकल चल जाए कहीं

जीवन को बाधा-मय पथ पर ले चले मेद से भरी भक्ति या कभी अपूर्ण अहंता में हो रागमयी-सी महाशक्ति व्यापकता नियति-प्रेरणा बन अपनी सीमा में रहे बंद सर्वज्ञ-ज्ञान का क्षुद्र-अंश विद्या बनकर कुछ रचे छंद

कत्तृर्त्व-सकल बनकर आये नश्वर-छाया-सी ललित-कला नित्यता विभाजित हो पल-पल में काल निरंतर चले ढला तुम समझ न सको, बुराई से शुभ-इच्छा की है बड़ी शक्ति हो विफल तर्क से भरी युक्ति।

जीवन सारा बन जाय युद्ध उस रक्त, अग्नि की वर्षा में बह जायँ सभी जो भाव शुद्ध अपनी शंकाओं से व्याकुल तुम अपने ही होकर विरुद्ध अपने को आवृत किये रहो दिखलाओ निज कृत्रिम स्वरूप वसुधा के समतल पर उन्नत चलता फिरता हो दंभ-स्तूप

तुम जरा मरण में चिर अशांत जिसको अब तक समझे थे सब जीवन में परिवर्तन अनंत अमरत्व वही अब भूलेगा तुम व्याकुल उसको कहो अंत

हाँ तुम ही हो अपने सहाय जो बुद्धि कहे उनको न मान कर फिर किसकी नर शरण जाय जितने विचार संस्कार रहे उनका न दूसरा है उपाय

सब अतीत में लीन हो चलीं, आशा, मधु-अभिलाषाएँ, प्रिय की निष्ठुर विजय हुई, पर यह तो मेरी हार नहीं !

जो मेरी है सृष्टि उसी से भीत रहूँ मैं, क्या अधिकार नहीं कि कभी अविनीत रहूँ मैं ?

विश्व एक बंधन विहीन परिवर्तन तो है, इसकी गति में रवि-शशि-तारे ये सब जो हैं।


यह नर्त्तन उन्मुक्त विश्व का स्पंदन द्रुततर, गतिमय होता चला जा रहा अपने लय पर।
कभी-कभी हम वही देखते पुनरावर्त्तन, उसे मानते नियम चल रहा जिससे जीवन।

जीवन में अभिशाप शाप में ताप भरा है, इस विनाश में सृष्टि-कुंज हो रहा हरा है।

आह प्रजापति यह न हुआ है, कभी न होगा, निर्वाधित अधिकार आज तक किसने भोगा ?’’ यह मनुष्य आकार चेतना का है विकसित, एक विश्व अपने आवरणों में है निर्मित ! चिति-केंद्रों में जो संघर्ष चला करता है, द्वयता का जो भाव सदा मन में भरता है।

व्यक्ति चेतना इसीलिए परतंत्र बनी-सी, रागपूर्ण, पर द्वेष-पंक में सतत सनी-सी।

यह जीवन उपयोग, यही है बुद्धि- साधना, अपना जिसमें श्रेय यही सुख की अराधना। लोक सुखी हो आश्रय ले यदि उस छाया में, प्राण सदृश तो रमो राष्ट्र की इस काया में। 


देश कल्पना काल परिधि में होती लय है, काल खोजता महाचेतना में निज क्षय है।

वह अनंत चेतन नचता है उन्मद गति से, तुम भी नाचो अपनी द्वयता में–विस्मृति में।


ताल-ताल पर चलो नहीं लय छूटे जिसमें, तुम न विवादी स्वर छेड़ो अनजाने इसमें।’’


किंतु आज अपराध हमारा अलग खड़ा है, हाँ में हाँ न मिलाऊँ तो अपराध बड़ा है।

बाधाओं का अतिक्रमण कर जो अबाध हो दौड़ चले, वही स्नेह अपराध हो उठा जो अब सीमा तोड़ चले।

अपना हो या औरों का सुख बढ़ा कि बस दुख बना वही, कौन बिंदु है रुक जाने का यह जैसे कुछ ज्ञात नहीं।

तुमने हँस-हँस मुझे सिखाया विश्व खेल है खेल चलो, तुमने मिलकर मुझे बताया सबसे करते मेल चलो।


अंध-तमस् है, किंतु प्रकृति का आकर्षण है खींच रहा, सब पर, हाँ अपने पर भी मैं झुँझलाता हूँ खीझ रहा।

नहीं पा सका हूँ मैं जैसे जो तुम देना चाह रही, क्षुद्र पात्र ! तुम उसमें कितनी मधु-धारा हो ढाल रही।

सब बाहर होता जाता है स्वगत उसे मैं कर न सका, बुद्धि-तर्क के छिद्र हुए थे हृदय हमारा भर न सका।

श्रम- भाग वर्ग बन गया जिन्हें, अपने बल का है गर्व उन्हें; नियमों की करनी सृष्टि जिन्हें, विप्लव की करनी 

चिति का स्वरूप यह नित्य-जगत, वह रूप बदलता है शत-शत; कण विरह-मिलन-मय नृत्य-निरत, उल्लासपूर्ण आनंद सतत; तल्लीन, पूर्ण है एक राग, झंकृत है केवल ‘जाग जाग !’’

लघुता मत देखो वक्ष चीर, जिसमें अनुशय बन घुसा तीर।’’

यह जीवन की मध्य-भूमि है रस-धारा से सिंचित होती, मधुर लालसा की लहरों से यह प्रवाहिका स्पंदित होती।


चिर-वसंत का यह उद्गम है पतझर होता एक ओर है, अमृत हलाहल यहाँ मिले हैं सुख-दुख बँधते, एक डोर हैं

श्रममय कोलाहल, पीड़नमय विकल प्रवर्त्तन महायंत्र का, क्षण भर भी विश्राम नहीं है प्राण दास है क्रिया-तंत्र का।

हम अन्य न और कुटुंबी हम केवल एक हमीं हैं, तुम सब मेरे अवयव हो जिसमें कुछ नहीं कमी है। 

© Ratish


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