April 22, 2020

Hindi Poem दरख़्त


ये दरख़्त है  इन दरख़्तों का क्या है
जहाँ पर ऊगे थे वहीं सारा जहाँ है


नीचे इनके ज़मीं है ऊपर आसमां है
मिलता सभी को इनसे आसरा है

हम ख़ानाबदोश ढूंढते जाने क्या है
न खुद की जड़े हैं न खुद का पता है























रतीश
Pune
22 April 2020

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