April 20, 2020

Hindi Poem लोहे की एक बैंच


इस राह पर कभी निकलता हूँ
अब भी ख़यालों में
कुछ दूर लोहे की एक बैंच है
काई जमी रहती है वहाँ
आँखे मूंदे बैठे उस पर 
ना जाने कितनी और
राहों पर निकल जाता हूँ



























रतीश
Pune
19 April 2020

No comments: