December 28, 2020

Hindi Poem Indrajeet इन्द्रजीत Part 2

इंद्रजीत (भाग २)

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आख्यान ने लिया यहाँ विराम 

प्रत्यक्ष शिथिल ह्रदय में जीवंत राम 

इंद्रजीत ने किया दिव्यायुध का संचार 

पराजय भी धर्म हेतु शिरोधार्य 


नियति नियम स्वातन्त्र्य विवेक 

निज जीवन मे रण मे है एक 

मर्यादापुरुषोत्तम रणकर्कश राम 

निस्तेज निष्प्राण निरीह स्वयं पूर्णकाम 

 

हा धिक्! जीवन यह कलंक सम

आक्रोश अधिक और शौर्य कम 

जाने क्या अब करें  उपाय 

रघुकुलदीपक कैसे वापस आए 

 

हनुमंत सुग्रीव अंगद जामवंत 

कर्म भक्ति ज्ञान का भी है अंत

जानकीवल्लभ ही हैं तारणहार

जानकी का श्रद्धा विश्वास अनंत 

 

दूरस्त तार्क्ष्य थे ध्यानमग्न 

फिर नाग बन रहे धर्मविघ्न 

माता की परवशता गत काल

नाग ही थे श्वेताश्व के काले बाल 

 

गरुण पक्षीप्रवर विनतासुत 

इंद्रजयी बल बुद्धि विद्या युक्त 

पौरुष से विजित किया देवामृत 

जननी को करने बन्धमुक्त

 

है  विषम स्तिथि या है स्वांग 

रहें तटस्थ या करें मर्यादा भंग 

नागान्तक ने किया गहन मनन   

हरि स्मरण कर उड़ चले गगन 


महावेग विहगपति व्योममार्ग 

क्षण में ध्वंसित था नागपाश 

रामानुज-राम की विमुक्ति 

गरुड़ बने संभावना से नियति 


मेघनाद सशंक भयाक्रांत

क्यों प्राणान्तक रिक्त प्रहार 

कर्मों से तप क्या हुआ ह्रास 

क्यों  तेजहीन हैं देवास्त्र 

 

शस्त्राभ्यास माया बल 

एक एक कर सब निष्फल 

अमोघास्त्र का नहीं प्रतिकार

कैसे धनुर्धारी कैसे संस्कार

 

सृष्टि का संतुलन नियम

नाग-नागान्तक भी है युग्म

वयं रक्षामः राक्षस संस्कृति 

पतन के ओर पुनरावृत्ति 

 

कैसे कोई नर भालू वानर 

सेना लंका तक ले आये 

क्यों युद्ध की सोची होगी 

जब देव भी हमसे थर्राए 


शिव-पार्वती के संग कैलाश उठाया अपने बाहुबल पर 

क्यों पिनाक पर प्रत्यंचा नहीं चढ़ा पाए उनके सक्षम कर 

सीता का पौरुष से वरण न हुआ जब बीच स्वयंवर 

कैसे बलवश वैदेही को लाये तब निर्जन में छलकर

 

माल्यवान विभीषण कुम्भकर्ण मात 

मंत्रणा नहीं किसी की आत्मसात

राक्षसकुल के अपकर्म संचित 

हव्य शमित धर्मानल भक्षित 


रण में बहे रुधिर स्वेद 

ऐसे में संयम विवेक 

नियति पर छोड़ा निर्णय

शक्तिधर का शक्ति एक्य

 

सीता शक्ति का साक्ष्य प्रमाण 

पुनर्जीवित हुए रघुनाथ राम 

निकुम्बिके! तुमसे मैं रक्षित 

कब तक रहूंगा मैं अविजित

 

स्वातन्त्र्य विवेक नियति नियम 

निज जीवन मे रण मे है सम 

रावनसुत का लंका को प्रण

अंतिम श्वास तक हो दुर्धर रण   

 

© Ratish

Pune Dec 2020

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