April 30, 2020

Hindi Poem जीवन है एक मादक मदिरा

आवाज़ों को तरसोगे तुम
चेहरा चेहरा ढूँढ़ोगे
जाने कौन नज़र आएगा
जब भी आंखें मूँदोगे

बीते मदहोशी की यादें 
यहाँ न कोई बाकी है 
न गुजरे पीनेवाले हैं
न पैमाने न साकी है

आज हो तुम जिनके संग
लम्हा लम्हा जी लो
जीवन है एक मादक मदिरा
मिल बाँट पी लो


रतीश
Pune

April 30 2020

April 28, 2020

Couplets पल सोहबत के

रिस के आती है जितनी
तेरी रौशनी मुझे काफ़ी है
पल सोहबत के कम ही सही
ऐसी जिंदगी मुझे काफ़ी है






















रतीश
Pune
April 28 2020

April 27, 2020

Couplets तेरे ये रहम


मुझपे तेरे ये रहम हैं तो हैं
आश्ना तेरे हम हैं तो हैं
एक तेरे नूर को छोड़कर
सारा आलम ये भरम है तो है



 











रतीश
Pune
April 27 2020

April 26, 2020

Couplets इल्म की राह

इल्म की राह है आसान इतनी
चलने वाला कहीं दूर चला जाता है
रुक गया कोई इस लम्हे में कभी
तुझसा होकर दीदार वही पाता है













रतीश
Pune
April 26 2020

Couplets जिल्द


तेरे बिन बेवजह कुछ इस तरह हूँ मैं
जैसे हो जिल्द कोई बिन किताबों के












रतीश
Pune
April 26 2020

April 25, 2020

Couplets मौज में रहते हैं

मौज में रहते हैं मौजों से हमें प्यार भी है
पानी में रहके हम उसके तलबगार भी हैं























रतीश
Pune
April 25 2020

Couplets बेनज़ीर

खुद की नज़र में अब भी मैं बेनज़ीर हूँ
तेरी से गिर गया हूँ शायद फक़ीर हूँ

रतीश
Pune
April 25 2020

Couplets इस नज़र के


इस नज़र के भी जाने कैसे ये करिश्मे हैं
देखना चाहूँ जो बस वो ही दिखाई दे है 





















रतीश
Pune
25 April 2020


April 24, 2020

couplets बिसात


खेल चल रहा है ये बिसात रख़ी है
सामने तेरे पूरी ये कायनात रख़ी है















रतीश
Pune
24  April 2020

April 23, 2020

Couplets अक्स



तेरे वजूद की झलक भी तेरी इनायत है 

वगर्ना तेरे अक्स से भी कोई राबता नहीं 





















रतीश
Pune
23 April 2020

April 22, 2020

Hindi Poem दरख़्त


ये दरख़्त है  इन दरख़्तों का क्या है
जहाँ पर ऊगे थे वहीं सारा जहाँ है


नीचे इनके ज़मीं है ऊपर आसमां है
मिलता सभी को इनसे आसरा है

हम ख़ानाबदोश ढूंढते जाने क्या है
न खुद की जड़े हैं न खुद का पता है























रतीश
Pune
22 April 2020

April 21, 2020

Couplets इंसा भी आदतन


पत्तों की तरह इंसा भी आदतन
रंग बदलते हैं और गिर जाते हैं






















रतीश
Pune
21 April 2020

Couplets न जाने मैं भी ये क्या पी रहा था

सामने क्या था
क्या दिख रहा था
न जाने मैं भी ये
क्या पी रहा था





रतीश
Pune
21 April 2020

April 20, 2020

Hindi Poem रेत पर ऊंगलियों से

ये खण्डहर भी महल थे शहर थे
यहाँ हाट लगते थे लोगों के घर थे
उन लोगों की थी जिंदगानी थी कहानी
यहाँ बस यही हैं ना है उनकी निशानी

हमारी जिंदगी के ये सारे किस्से 

लिखे जैसे रेत पर ऊंगलिओं से















रतीश
Pune
20 April 2020

Hindi Poem लोहे की एक बैंच


इस राह पर कभी निकलता हूँ
अब भी ख़यालों में
कुछ दूर लोहे की एक बैंच है
काई जमी रहती है वहाँ
आँखे मूंदे बैठे उस पर 
ना जाने कितनी और
राहों पर निकल जाता हूँ



























रतीश
Pune
19 April 2020

April 19, 2020

Couplets तेज़ जितना जाओगे

तेज़ जितना जाओगे धुंधला लगेगा उतना सफर
हर लम्हे में ठहरकर जिंदगी अपनी सँवार लो

रतीश
Pune

19 April 2020

Couplets क्यों कहते फ़िरे इस आसमां को आसमां

यूं ही क्यों कहते फ़िरे इस आसमां को आसमां
इस से ज्यादा बुलंद तो मेरी चाह प्रति क्षण में है

© Ratish

19 April 2020
Pune

Couplets मेरे सामने मेरा यार था

आप ही बज उठा
खींचा हुआ सा तार था
होश में कैसे रहें
मेरे सामने मेरा यार था 







© Ratish
19 April 2020
Pune

April 18, 2020

Couplets फिर नया सा प्यार दो


जो कभी किसी से कहा नहीं
उसे कागजों पर उभार दो

ये जख्म है बड़े कीमती
इन्हे फिर नया सा प्यार दो



© Ratish
Pune
18 April 2020

Couplets बस तू ही दिखाई दे है

एक दौर वो भी था
जब खोजते थे तेरे निशान
एक लम्हा ये भी है
बस तू ही दिखाई दे है

© Ratish
Pune
18 April 2020

April 16, 2020

Hindi Poem Indrajeet इन्द्रजीत

I had started writing on Indrajeet as one of the pre-eminent warrior who was both highly skilled and had an advantage of being a mayavi which he used to vanquish enemies in any warfare.
In the current context we are only left with people who spread misinformation and are full of deceit. And they use what ever means possible towards their end.

इन्द्रजीत

अस्त्र शास्त्र थे सुसज्जित यज्ञशाल में
लपटें लील लेती थी आहुतियाँ भी थाल से
अपराजेय इंद्रजीत अर्चि सा धधक रहा
जो क्रुद्ध हो बरसने शत्रुदल तृण विशाल में

रक्षासश्रेष्ठ युवराज युद्धकौशल दक्ष था
विजय थी वहीं रावणि जिस पक्ष था
पितृव्य, भ्राता, परिजन काल के ग्रास थे
रावणसुत स्वयं काल सा काल के समक्ष था

दिव्यायुध अर्जित किये तपोबल ज्ञान से
माया के संचार में विश्वजीतअप्रतिम था
जय सर्वोपरि थी न कोई नियम मान्य था
सत्य से भी बड़ा राक्षसकुल का सम्मान था

पूर्णाहुति के पर्यंत वटवृक्ष पर दी बली
अभिमंत्रित किये रथ, शस्त्र और सारथी
रणकर्कश रावणि रथारूढ़ नभपथ उड़ा 
हर्षित राक्षस सेना सिंहनाद करते चली

व्योम से दारुण बाण वृष्टि थी निरंतर
मर्कट वीर हत क्षत गिरे समरभूमि पर 
वानरयूथपति अदृश्य शत्रु वार से थे विकल
त्राहि माम महाविराव गूंजा हर ओर स्वर

वानरसेना विध्वंस करता  मेघनाद बढ़ा द्रुतगति 
भ्रम और संहार शक्ति से परिपूर्ण वह अतिरथी
राम-लक्ष्मण मूर्छित किये अभिमंत्रित प्रहार से
हर्षित देवशत्रुवाहिनी लंकावृत्ति - जयति रावणि!

रणश्रेष्ठ दशरथनन्दनों को अचेत देख कर
स्तब्ध-निराश्ररित था मर्केट भालूक शिविर
युद्ध में रघुकुल सूर्य शौर्य था ढक गया
मायावी इंद्रजीत था तमोमय सलीलधर 

विस्मय ! अगणित क्षत विक्षत वीर शांत
विस्मय !  विजित पाषण तारक रमाकांत
विस्मय ! स्वयं शेष सौमित्र बंधे नागपाश
अहो ! कराल समर का हो रहा अनिष्टांत

Link to Part 2 of the Poem

© Ratish
Pune
16 April 2020

#Indrajeet #Meghnad #Ravani #Vishwajeet
#इन्द्रजीत    #मेघनाद    #रावणि #विश्वजीत

Couplets: देख कर तुझको बचपन याद आता है

देख कर तुझको बचपन याद आता है
वो सादगी वो भोलापन याद आता है
याद आती है वो बेफिक्री वो बेपरवाही
और अपनों का अपनापन याद आता है

© Ratish
Pune
16 April 2020

April 15, 2020

Couplets मेरे रक़ीब


मेरे रक़ीब चल साथ बैठ कर पीते हैं
तेरे दीदार से मुझको वो याद आता है


© Ratish
15 April 2020
Pune

April 14, 2020

Couplets मैं भी कभी मैं था

तुझको देखता हूँ तो खुदा याद आता है
मैं भी कभी मैं था ये याद आता है

© Ratish
14 April 2020
Pune

Couplets देखा है तुझमें क्या-क्या

मेरी नज़रों ने बना दिया तुझकोअधिक हसीं
ये चाहत, ये कशिश, ये दीवानगी आसां तो नहीं
देखा है तुझमें क्या-क्या कैसे मैं  क्या ये कहूँ
है मय, है जाम, है नशा है, तू है मेरी ज़िन्दगी


© Ratish
14 April 2020
Pune

Couplets थोड़ा दरिया सा फिर बनाओ मुझे

लहरों अब आ कर डुबाओ मुझे
थोड़ा दरिया सा फिर बनाओ मुझे
सूखा पड़ा हूँ रेत सा साहिल पर
आगोश में लेकर हदें फिर भुलाओ मुझे

© Ratish
14 April 2020
Pune


April 13, 2020

Couplets तेरा करम तेरा रहम

जो कभी दो जहां था चाहता
मांगे आज वह पोहा चाय
तेरा करम तेरा रहम
वो भी मिला ये भी पाए


© Ratish
13th April 2020
Pune

April 12, 2020

Reflections



Two score and three years ago I came into being. The scale of time extends to infinity in both directions. We all have a finite time here to live, contribute and prosper. The current situation only accentuates further the fragility of our lives. 

Looking back on my journey one constant that I find is an aspiration to learn and understand. I can come to terms with a thought that I do not have the answers. What I find harder is to give up the quest to understand and live a more meaningful life. 

 This quest has taken me across oceans, changed the direction of my life innumerable times. Led me to commit some atrocious mistakes and errors of judgement. I have fallen flat on my face. I have also received help and support for which I was not worthy. I have been fortunate to be among friends no matter where I was, 

 In this moment of reflection I would like to share a few themes that have guided me
  1. Dream Big
  2. Make it real 
  3. When you get there there is no there there
  4. Enjoy the moment and the process
  5. Leave things better than you found them
Let me also take this opportunity to thank you all for being part of my life and enriching it with your presence.
  
© Ratish
12 Apr 2020
Pune

Readings: Sanskrit Vyasa - Remain unaffected by the miseries of this world

जिस प्रकार पर्वत के शिखर से नीचे की सभी भूमि समतल प्रतीत होती है उसी प्रकार बोध के भाव में स्थित व्यक्ति के  लिए दुःख (परिकूल स्थिति) भी संताप का कारण नहीं बनती।

All the low lying regions is perceived to be flat while observing from the peaks of mountain,  in the same way for people who embody wisdom remain unaffected by the miseries of this world.

#Vyasa #Sanskrit  #equanimity #wisdom

April 11, 2020

Photos 1


Hindi Poem - एक बारगी फिर सोच लो


एक बारगी फिर सोच लो 


कभी ऑंखें मूँद कर बैठना
कहीं चाय पर वो गुफ़्तगू
लिख़ लेना जो अच्छा हो पढ़ा
हांथों से अपने हूबहू

ये आज कल जो मंडी है
बिकता है हीरा कोयले की तरह
ये मंज़र, ये लोग, ये लम्हे भूल कर
क्या ढूँढ़ते हैं हम दरबदर

एक बारगी फिर सोच लो 
जिसकी तुम्हें दरकार  है
तुम नूर हो इस जहान के
कहीं सीमित तो नहीं विचार हैं




© Ratish
11 April 2020
Pune