I had started writing on Indrajeet as one of the pre-eminent warrior who
was both highly skilled and had an advantage of being a mayavi which he
used to vanquish enemies in any warfare.
In the current context we
are only left with people who spread misinformation and are full of
deceit. And they use what ever means possible towards their end.
इन्द्रजीत
अस्त्र शास्त्र थे सुसज्जित यज्ञशाल में
लपटें लील लेती थी आहुतियाँ भी थाल से
अपराजेय इंद्रजीत अर्चि सा धधक रहा
जो क्रुद्ध हो बरसने शत्रुदल तृण विशाल में
रक्षासश्रेष्ठ युवराज युद्धकौशल दक्ष था
विजय थी वहीं रावणि जिस पक्ष था
पितृव्य, भ्राता, परिजन काल के ग्रास थे
रावणसुत स्वयं काल सा काल के समक्ष था
दिव्यायुध अर्जित किये तपोबल ज्ञान से
माया के संचार में विश्वजीतअप्रतिम था
जय सर्वोपरि थी न कोई नियम मान्य था
सत्य से भी बड़ा राक्षसकुल का सम्मान था
पूर्णाहुति के पर्यंत वटवृक्ष पर दी बली
अभिमंत्रित किये रथ, शस्त्र और सारथी
रणकर्कश रावणि रथारूढ़ नभपथ उड़ा
हर्षित राक्षस सेना सिंहनाद करते चली
व्योम से दारुण बाण वृष्टि थी निरंतर
मर्कट वीर हत क्षत गिरे समरभूमि पर
वानरयूथपति अदृश्य शत्रु वार से थे विकल
त्राहि माम महाविराव गूंजा हर ओर स्वर
वानरसेना विध्वंस करता मेघनाद बढ़ा द्रुतगति
भ्रम और संहार शक्ति से परिपूर्ण वह अतिरथी
राम-लक्ष्मण मूर्छित किये अभिमंत्रित प्रहार से
हर्षित देवशत्रुवाहिनी लंकावृत्ति - जयति रावणि!
रणश्रेष्ठ दशरथनन्दनों को अचेत देख कर
स्तब्ध-निराश्ररित था मर्केट भालूक शिविर
युद्ध में रघुकुल सूर्य शौर्य था ढक गया
मायावी इंद्रजीत था तमोमय सलीलधर
विस्मय ! अगणित क्षत विक्षत वीर शांत
विस्मय ! विजित पाषण तारक रमाकांत
विस्मय ! स्वयं शेष सौमित्र बंधे नागपाश
अहो ! कराल समर का हो रहा अनिष्टांत
Link to Part 2 of the Poem
© Ratish
Pune
16 April 2020
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