May 25, 2025

सहज मैं हो गया


जीवन के मधु और कटु
पलों को अधरों से लगा
पी चुका था
गरलामृत का घड़ा

स्वेद रक्त धूल से
कलुषित तन में
हो गया था क्लिष्ट
अंतःकरण मेरा

शीतानिल मेघ-वृष्टि से
जैसे धुलती है धरा
तुम से मिल
सहज मैं हो गया 

25 May

© Ratish

May 24, 2025

सिखा दिया तुमने


मुझे फिर से सिखा दिया तुमने 
कोई आईना दिखा दिया तुमने
उलझ गया था लफ्ज़ों में कहीं 
ख़ामोशी से मिला दिया तुमने 

कहना आता था करना आता था 
चलना आता था बहना आता था
होना और रहना सिखा दिया तुमने 
मुझको मुझसे ही मिला दिया तुमने

24 May
© Ratish

May 21, 2025

अब तुम मेरे भीतर हो और बाहर भी

अब तुम मेरे भीतर हो और बाहर भी
ठीक किसी प्रिय स्मरणीय गीत की तरह
बजता है तो बाहर से सुनाई देता है
पढ़ लूं, तो भीतर से सुर-संगीत उभरते हैं

अब तुम मेरे भीतर हो और बाहर भी
ठीक किसी स्वजन मित्र मनमीत की तरह
बाहर हो जब मिलते हो या संवाद होता है
वर्ना भीतर तेरी यादों की जुगाली करता हूंँ

रतीश
21 May

© Ratish
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May 19, 2025

Hindi Poem: रहेगा वो

जब यादें मद्धम होगीं 
तब जाने क्या रह जाएगा 
जब यादें मद्धम होगीं 
तब कौन पास आएगा
होगी एक दिन रौशनी 
नज़रों की भी मद्धम
रंगों, चेहरों और जगहों 
को फिर कौन देख पाएगा 
एक दिन ये आवाज़े 
भी होंगी मद्धम 
कौन कहेगा कौन सुनेगा 
कौन समझ पाएगा 
ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेंद्रियांँ 
भी सब होंगे मद्धम
अंतःकरण का प्रभाव 
भी क्षिण हो जाएगा 
रहेगा वो जो था, है और रहेगा सदा
बाकी सब क्रमशः जीर्ण होता जाएगा 

19 May
रतीश

अंतःकरण = मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार

© Ratish

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May 03, 2025

Hindi Poem कितना तन्हा हूंँ

जाने क्यों होती है सहर हर रात के बाद 
जाने क्या रह जाता है हर बात के बाद
तुझसे मिलकर मैं खुद से मिलता हूंँ
जाने क्या होता है मुलाकात के बाद 
अब तो अपना मिलना भी नहीं होता
कितना तन्हा हूंँ ऐसे हालात के बाद 

रतीश
3 May

© Ratish

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May 01, 2025

इस ओर से उस ओर

वक्त की डोर ले चली है
इस ओर से उस ओर
हम भी क्या से क्या हो गए
इस ओर से उस ओर

जाने कब कैसे ऐसे हो गए
रिश्तों से महंगे पैसे हो गए
जाने कब चुन ली हमने खुशी 
की जगह संघर्ष और शोर

तुम भी मुझे थाम तो सकते थे
दो घड़ी आराम के हो सकते थे
है तुम्हारा भी मेरे जैसा ही हाल
अपने अपने चक्रव्यूह का जंजाल

सोचो या कुछ भी नहीं सोचो
करो या कुछ भी नहीं करो
सबसे बिसरेगा ही यह ठौर
जाना है इक छोर से दूजे छोर

फिर भी क्या सोचे जाते हैं
फिर भी क्या करे जाते हैं
जिंदगी को कौड़ियों में लुटाते
गुजरते इस ओर से उस ओर

रतीश
1 May


© Ratish

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April 30, 2025

हर रोज़ बदलता हूंँ

कुछ रोज़ पुराने अखबारों सा
रद्दी में पड़ा रहता हूंँ
कभी आनेवाले पल के लिए
कतारों में खड़ा रहता हूंँ

हर रोज़ बदलता हूंँ लेकिन
खुद को वहीं कहता हूंँ
अपनी यादों, इरादों के संग
पुराने घर में ही रहता हूंँ

रतीश
30-Apr

© Ratish
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April 16, 2025

कोई मलाल मत रखना

मेरे जैसा तुम अपना हाल मत रखना
दिल में अपने कोई मलाल मत रखना
रखना सब संजोए जो भी होकर गुजरा
जो नहीं हुआ उसका ख्याल मत रखना

रतीश
16 Apr


© Ratish



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April 12, 2025

Hindi Poem मुस्काए हुए हैं

माना तेरे नूर से रौशन नहीं हम
अंधेरे भी तुमसे ही छाए हुए हैं
दुनिया में बहुत कुछ है लेकिन
ध्यान अंदर अपने लगाए हुए हैं

बाजा़र में दाम लगा है सबका
झोला हम भी लटकाए हुए हैं
वक्त की चाल में देख अपनी हालत
हालात खयालात पे मुस्काए हुए हैं
रतीश
12 Apr


© Ratish


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April 05, 2025

When will we live

We are no longer young
We are not yet too old
We don't like to do
What we have been told
We have lost our innocent smile
Too much has passed in front of our eyes
Triumph, passion, power, purpose, love and grief
Are precious colored candies
we run after in misbelief
Time is constantly fleeting ahead and away
When will we live, rejoice, find our true way

Ratish
5 Apr
Bilaspur 
© Ratish

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April 02, 2025

तुम पूर्व स्वर्ण रश्मि

तुम पूर्व स्वर्ण रश्मि सम प्रखर
मैं मेघाच्छादित घनश्याम प्रिये
तुम चंदन का तरुण तरुवर
मैं उसपे लिपटा नाग प्रिये
तुम अलकनन्दा का शीतल जल
मैं प्रचण्ड दावानल की आग प्रिये
तुम जीवन का सुखमय पल
मै रुधिर की रिसती धार प्रिये
तुम आज मेरा, तुम बीता कल
तुम कल होने वाला प्यार प्रिये
बस डरता हूंँ कुछ कहने से
कहीं दो ना तुम दुत्कार प्रिये

रतीश
1 Apr
Bilaspur

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© Ratish

March 08, 2025

On Women's Day

What can we even say
You enrich our lives everyday
Expectations from you
are unreasonable, unfair
Yet you ace them
everytime with a flair
Don't ever doubt or dispair
It's you who sustain everything everywhere
Ratish
8 Mar 25 

© Ratish

March 02, 2025

Forgive my indescretions

I am inclined yet
reluctant to reach out
To honour your choice
of maintaining distance
and staying away from the crowd
Please forgive my indescretions 
when I seek opportunities 
of throwing pebbles in zest
In a placid lake as a test
To see momentry ripples
That dance uninhibited  
Reminding me of waves
Of a gushing river
You once were
And who now prefers
Her oceanic solitude

2 Mar 25
Ratish
Bilaspur 

© Ratish

February 18, 2025

सुपुर्देखाक

तेरी गली में आए भी 
दीदार भी हुआ 
गोया कुछ ऐसा खो गया
कि कुछ भी नहीं रहा 

इक आखरी दीदार भी
करके आ गए
मिट्टी को सुपुर्देखाक 
करके आ गए

© Ratish
18 Feb 25

February 10, 2025

पूछ मत

तुम्हें क्या मिला मुझे क्या पता
मुझे क्या मिला ये पूछ मत
मैं चिराग सा अब भी जल रहा
तेरी नज़र का असर पूछ मत

© Ratish
10 Feb 25