December 25, 2021

Hindi Poem हिन्दी कविता: पुल

फिर मैं पुल पे चल रहा था
कभी रेत कभी पानी पे छाया
पंछी बसे पानी और नभ में
मिलती ही है यथार्थ से माया

जब पक्षी सतह पे उड़ते
बिम्ब प्रतिबिम्ब हमें दिखता
ऊंची अगर ये उड़ान हो तो
जाएगा कहां बनके ये साया
                                  रतीश
                                  25 Dec 21


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October 24, 2021

हर घड़ी बेसुध क्यों न रहें Hindi Poem

तेरा साया क्यों है मेरे ऊपर
उठ गया तो भी कहां जाएगा
संग हैं तेरे तो समा है यहां
इसके जाने का वक्त आएगा

हर घड़ी बेसुध क्यों न रहें
कल न महफ़िल न साकी हो
वक्त तो आता जाता रहता है
सांसें किसमें कितनी बाकी हो



रतीश
बिलासपुर
24 October 21

© Ratish


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September 12, 2021

Hindi Poem: स्वच्छंद

प्रतिभा को कर प्रखर
पुरुषार्थ का संचार कर
विवेक, श्रम  से सतत्
अवरोध का संहार कर

आरुढ़ हो स्वानंद में
आनंद का संचार कर
इच्छा ज्ञान क्रिया में रहकर
स्वच्छंद सा व्यवहार कर

 


© Ratish

12th September 2021

Bilaspur 

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Hindi Poem: फिर से

मुझसे मिलने वो आ गया फिर से
मुझको मुझसे मिला गया फिर से
मुझमें जो कुछ भी मेरा अपना था
सारा का सारा भुला गया फिर से
 

 

 © Ratish

 

11th September 2021

Bilaspur 

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September 05, 2021

Hindi Poem और है क्या

सुन रहा हू़ॅं जिसे हर क्षण
गूंज तेरी है और है क्या
देखते हैं नयन जिसे हर कण
तू ही है और है क्या

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© Ratish
बिलासपुर
5 September 21

June 27, 2021

नर्म बूंदें

नर्म बूंदें

 
हम जब तपते हैं झुलस जाते है
दूर बादल बनते हैं खिचें आते है
हैं नर्म बूंदें बारिश की बडी़
पिछले मौसम भूल जाते है

मेरी सोहबत का है ये असर
आँखों का पानी हो जाए शरर* (*चिंगारी)
तेरी इनायत का राज़ तू जाने
नर्म बूंदें जो बरसे मुझ पर
 
27 जून
रतीश
बिलासपुर

 

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© Ratish

June 16, 2021

जाहिर है तेरी हस्ती

खुलने लगी हैं दीवारों की परतें कहीं कहीं
दिखने लगी हैं पुरानी रंगों-रंगत कहीं कहीं
 
जाने कितने लिबास तूने पहन रक्खे हैं
जाहिर है तेरी हस्ती फिर भी कहीं कहीं
 
१६ जून
रतीश
बिलासपुर

 




 

© Ratish

16th June 

Bilaspur 

#कविता #काव्य #शायरी #Poetry #Poem #Shayari

June 13, 2021

तूने मुझको अपना दीवाना बनाया ही नहीं

तूने मुझको अपना दीवाना बनाया ही नहीं 

कब क्या हो गया ये मेरी समझ आया ही नहीं 

मेरी आँखों में तुझे  ताउम्र को बस जाना था 

लेकिन भूले से कभी ख्वाबों में आया भी नहीं 

तू मेरे संग था, है और रहेगा सदा 

न छुपाया कभी तो तूने जताया भी नहीं

रतीश 

१३ जून

बिलासपुर 

 


 

 

 

© Ratish

13th June 

Bilaspur 

#कविता #काव्य #Poetry #Shayari #शायरी #Poem

Kavita, Couplets: पत्ता हूँ I am a leaf

पत्ता हूँ , हवाओं से हिल रहा हूँ मैं 

तुझसे जुड़े बिना खुद सा नहीं हूँ मैं

 

I am a leaf

Can still sway in the wind

Without your association

I cease to be self

 


© Ratish

13th June

Bilaspur

 

#Kavita,  #Shayri #Poetry #Poem

June 12, 2021

Hindi Kavita विस्तार में यह समुद्र है


 

पत्तों पर ठहरी बूंदों से हम हैं
अनित्य, नश्वर यह जीवन है
 
स्वच्छंदता  का सतत भ्रम है
मृगमरीचिका है,  दिवास्वप्न है
 
बूदें परिधि में क्षूद्र हैं
विस्तार में यह समुद्र है
 

 © Ratish

12 जून 

बिलासपुर

 

#कविता #kavita #Poem #Poetry

May 14, 2021

Couplets फलक का चाँद लेकिन हमेशा मेरा था

पैरों तले जमीं कभी अजनबी भी थी
फलक का चाँद लेकिन हमेशा मेरा था 
एकटक देख लेते निगाह भर के उसे
जैसे मेरी यादों में रौशन चेहरा तेरा था
रतीश

© Ratish
14 May 2021
Bilaspur

April 17, 2021

Readings #Sanskrit Nasadiya Sukta Hymn of Creation #नासदीय सूक्त #ऋग्वेद

नासदीय सूक्त (ऋग्वेद )

नासदासीन नो सदासीत तदानीं नासीद रजो नो वयोमापरो यत |
किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद गहनं गभीरम ||
 
न मर्त्युरासीदम्र्तं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः |
आनीदवातं सवधया तदेकं तस्माद्धान्यन न परः किं चनास ||
 
तम आसीत तमसा गूळमग्रे.अप्रकेतं सलिलं सर्वमािदम |
तुछ्येनाभ्वपिहितं यदासीत तपसस्तन्महिनाजायतैकम ||
 
कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः परथमं यदासीत |
सतो बन्धुमसति निरविन्दन हर्दि परतीष्याकवयो मनीषा ||
 
तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषामधः सविदासी.अ.अ.अत |
रेतोधाासन महिमान आसन सवधा अवस्तात परयतिः परस्तात ||
 
को अद्धा वेद क इह पर वोचत कुत आजाता कुत इयंविस्र्ष्टिः |
अर्वाग देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यताबभूव ||
 
इयं विस्र्ष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न |
यो अस्याध्यक्षः परमे वयोमन सो अङग वेद यदि वा नवेद |
 
Then there was neither non-existence nor existence, Then there was neither space, nor the sky beyond. What covered it? Where was it? What sheltered it? Was there water, in depths unfathomed? 
 
Then there was neither death nor immortality Nor was there then the division between night and day. That One breathed, breathlessly and self-sustaining. There was that One then, and there was no other.
 
In the beginning there was only darkness, veiled in darkness, In profound darkness, a water without light. All that existed then was void and formless. That One arose at last, born of the power of heat. 
 
In the beginning arose desire, That primal seed, born of the mind. The sages who searched their hearts with , Discovered the link of the existent to the non-existent. 
 
And they stretched their cord of vision across the void, What was above? What was below? Then seeds were sown and mighty power arose, Below was strength, Above was impulse. 
 
Who really knows? And who can say? Whence did it all come? And how did creation happen? The gods themselves are later than creation, So who knows truly whence this great creation sprang?
 
Who knows whence this creation had its origin? He, whether He fashioned it or whether He did not, He, who surveys it all from the highest heaven, He knows—or maybe even He does not know.
 
Rig #Veda Book 10 Hymn 129
Nasadiya Sukta

February 20, 2021

Readings: #Sanskrit # तस्य भासा सर्वमिदं विभाति by this light alone everything appears

 
भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ 2.11 #मुण्डकोपनिषद्
 
उसके प्रकाश में  ही सब कुछ भासित होता है , वह एक (प्रकाश) ही सभी में दैदीप्यमान है।  सूर्य, चंद्रमा, तारे, बिजली या यह अग्नि उसे कैसे प्रकाशित कर सकती है ?

Everything is illuminated in that light, by this light alone everything (reality/forms) appears. Sun, Moon, Stars, Lightning or this fire can not illuminate it by their own light. 

#Mundaka #Upanishad
॥ 2.11

In Kashmir Shaivaism Ultimate reality has two dimensions Prakasha (प्रकाश / Light /Shiva) and Vimsarsha (विमर्श / Shakti/Svatantraya)


 

#Paratrimsika  #परात्रिंशिका

February 13, 2021

Hindi Poem: आ ले भी ले जो है तेरा

माँगा भी क्या 
जो हक है तेरा
आ ले भी ले
जो है तेरा

तू जो है तो
है सब कुछ सही
तेरे सिवा
क्या है मेरा

आ बैठ जा
फिर दरमियाँ
सुन ले फिर से 
खामोशीयाँ

सासों की लय
फिर मद्धम चले
घुलने लगें फिर ये
दूरियाँँ

तुम से ही है
सब कुछ मेरा
आ ले भी ले
जो है तेरा

© Ratish
पूना 
13th Feb 2021