June 12, 2021

Hindi Kavita विस्तार में यह समुद्र है


 

पत्तों पर ठहरी बूंदों से हम हैं
अनित्य, नश्वर यह जीवन है
 
स्वच्छंदता  का सतत भ्रम है
मृगमरीचिका है,  दिवास्वप्न है
 
बूदें परिधि में क्षूद्र हैं
विस्तार में यह समुद्र है
 

 © Ratish

12 जून 

बिलासपुर

 

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