नर्म बूंदें
हम जब तपते हैं झुलस जाते है
दूर बादल बनते हैं खिचें आते है
हैं नर्म बूंदें बारिश की बडी़
पिछले मौसम भूल जाते है
मेरी सोहबत का है ये असर
आँखों का पानी हो जाए शरर* (*चिंगारी)
तेरी इनायत का राज़ तू जाने
नर्म बूंदें जो बरसे मुझ पर
27 जून
रतीश
बिलासपुर
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© Ratish

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