नर्म बूंदें
#Poetry #Poem #shayri #couplets #कविता #काव्य #शायरी
© Ratish
#Poetry #Poem #shayri #couplets #कविता #काव्य #शायरी
© Ratish
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16th June
Bilaspur
#कविता #काव्य #शायरी #Poetry #Poem #Shayariतूने मुझको अपना दीवाना बनाया ही नहीं
कब क्या हो गया ये मेरी समझ आया ही नहीं
मेरी आँखों में तुझे ताउम्र को बस जाना था
लेकिन भूले से कभी ख्वाबों में आया भी नहीं
तू मेरे संग था, है और रहेगा सदा
न छुपाया कभी तो तूने जताया भी नहीं
रतीश
१३ जून
बिलासपुर
© Ratish
13th June
Bilaspur
#कविता #काव्य #Poetry #Shayari #शायरी #Poem
पत्ता हूँ , हवाओं से हिल रहा हूँ मैं
तुझसे जुड़े बिना खुद सा नहीं हूँ मैं
I am a leaf
Can still sway in the wind
Without your association
I cease to be self
© Ratish
13th June
Bilaspur
#Kavita, #Shayri #Poetry #Poem
© Ratish
12 जून
बिलासपुर
#कविता #kavita #Poem #Poetry
In Kashmir Shaivaism Ultimate reality has two dimensions Prakasha (प्रकाश / Light /Shiva) and Vimsarsha (विमर्श / Shakti/Svatantraya)
#Paratrimsika #परात्रिंशिका
इंद्रजीत (भाग २)
आख्यान ने लिया यहाँ विराम
प्रत्यक्ष शिथिल ह्रदय में जीवंत राम
इंद्रजीत ने किया दिव्यायुध का संचार
पराजय भी धर्म हेतु शिरोधार्य
नियति नियम स्वातन्त्र्य विवेक
निज जीवन मे रण मे है एक
मर्यादापुरुषोत्तम रणकर्कश राम
निस्तेज निष्प्राण निरीह स्वयं पूर्णकाम
हा धिक्! जीवन यह कलंक सम
आक्रोश अधिक और शौर्य कम
जाने क्या अब करें उपाय
रघुकुलदीपक कैसे वापस आए
हनुमंत सुग्रीव अंगद जामवंत
कर्म भक्ति ज्ञान का भी है अंत
जानकीवल्लभ ही हैं तारणहार
जानकी का श्रद्धा विश्वास अनंत
दूरस्त तार्क्ष्य थे ध्यानमग्न
फिर नाग बन रहे धर्मविघ्न
माता की परवशता गत काल
नाग ही थे श्वेताश्व के काले बाल
गरुण पक्षीप्रवर विनतासुत
इंद्रजयी बल बुद्धि विद्या युक्त
पौरुष से विजित किया देवामृत
जननी को करने बन्धमुक्त
है विषम स्तिथि या है स्वांग
रहें तटस्थ या करें मर्यादा भंग
नागान्तक ने किया गहन मनन
हरि स्मरण कर उड़ चले गगन
महावेग विहगपति व्योममार्ग
क्षण में ध्वंसित था नागपाश
रामानुज-राम की विमुक्ति
गरुड़ बने संभावना से नियति
मेघनाद सशंक भयाक्रांत
क्यों प्राणान्तक रिक्त प्रहार
कर्मों से तप क्या हुआ ह्रास
क्यों तेजहीन हैं देवास्त्र
शस्त्राभ्यास माया बल
एक एक कर सब निष्फल
अमोघास्त्र का नहीं प्रतिकार
कैसे धनुर्धारी कैसे संस्कार
सृष्टि का संतुलन नियम
नाग-नागान्तक भी है युग्म
वयं रक्षामः राक्षस संस्कृति
पतन के ओर पुनरावृत्ति
कैसे कोई नर भालू वानर
सेना लंका तक ले आये
क्यों युद्ध की सोची होगी
जब देव भी हमसे थर्राए
शिव-पार्वती के संग कैलाश उठाया अपने बाहुबल पर
क्यों पिनाक पर प्रत्यंचा नहीं चढ़ा पाए उनके सक्षम कर
सीता का पौरुष से वरण न हुआ जब बीच स्वयंवर
कैसे बलवश वैदेही को लाये तब निर्जन में छलकर
माल्यवान विभीषण कुम्भकर्ण मात
मंत्रणा नहीं किसी की आत्मसात
राक्षसकुल के अपकर्म संचित
हव्य शमित धर्मानल भक्षित
रण में बहे रुधिर स्वेद
ऐसे में संयम विवेक
नियति पर छोड़ा निर्णय
शक्तिधर का शक्ति एक्य
सीता शक्ति का साक्ष्य प्रमाण
पुनर्जीवित हुए रघुनाथ राम
निकुम्बिके! तुमसे मैं रक्षित
कब तक रहूंगा मैं अविजित
स्वातन्त्र्य विवेक नियति नियम
निज जीवन मे रण मे है सम
रावनसुत का लंका को प्रण
अंतिम श्वास तक हो दुर्धर रण
© Ratish
Pune Dec 2020
बिन कुछ किये भी
धूल जमती रहती है
सासें भी लय के बीच
थमती रहती है
करते हैं हम जो जमा
ये कपड़े लत्ते सब
बनेंगे ये कूड़ा कर्कट
ये पोथी पत्रे सब
न जाने कौन कहाँ से
आया है क्यों हमारे पास
न जाने कब तक रहेगा
ये सब हमारे पास
हो सके तो भुला दो
ये धूल, मिट्टी, मल
सांसें आग सी बना लो
जीवंत, निश्चल, कांत
© Ratish
पूना
17th Nov 2020
#HindiPoetry #हिंदी #कविता
देवी स्त्रोत
तव च काचन न स्तुतिरम्बिके!
सकलशब्दमयी किल ते तनुः ।
निखिलमूर्तिषु मे भवदन्वयो
मनसिजासु बहिष्प्रसरासु च ॥
इति विचिन्त्य शिवे शमिताशिवे
जगति जातमयत्नवशादिदम् ।
स्तुतिजपार्चनचिन्तनवर्जिता
न खलु काचन कालकलापि मे ॥
अभिनवगुप्त
अम्बिके! क्या तुम्हारी स्तुति है और क्या नहीं है? जब तुम निश्चय ही समस्त शब्दों को अपने देह में धारण करने वाली हो (अर्थात सब कुछ तुम्हारी स्तुति ही है)। सभी भिन्न रूपों में भी आप ही अन्वय रूप से स्थित हैं । मन में स्थित एवं बहार प्रसार करने वाले समस्त विचारों में आप ही हो।
हे देवी! गहन विचार और उसके निवारण के बाद यह ज्ञात हुआ कि इस जगत की उत्पत्ति अयत्नवश है। क्या आपकी स्तुति, जप, अर्चना एवं चिंतन किये बिना भी मैं हर क्षण निश्चय ही आपकी ही स्तुति में लीन नहीं हूँ? (अर्थात मेरे समस्त कार्यकलाप तुम्हारी स्तुति ही है)
Ambike! what is and what is not your praise when all the forms for words surely reside in your universal body. In all the forms I can only see your presence and you are in every resting and wandering thoughts.
I have deeply contemplated and then concluded that this world is created spontaneously. And without external forms of adulation ( Stuti, Japa, Archana, Chintan) I am constantly immersed in your praise.
Link Below - Explanation by Swami Laxman Joo of the above verse and its transcript
Transcript: https://www.lakshmanjooacademy.org/devi-stotra-by-abhinavagupta/
उथले शब्दों के समक्ष
स्थिर हूँ ,मौन हूँ
निःशब्द कभी वाचाल
स्पंद नाद गूँज हूँ
पांडित्य के लिए
निज अनुभूति हूँ
कला काल को लांघती
रसपूर्ण रीति हूँ
कर्त्तव्य कार्य सहज दक्ष
रूचि राग सकल पक्ष
आनासक्ति भोग सतत सम
स्व स्थित जगत समक्ष
पूना
4th October 2020
© Ratish