परिप्रेक्ष्य
ऋतुवों का परिर्वतन ऊषा-निशा
क्रम
बह्माण्ड राग भैरव लय-प्रलय नियम
जीवन का विस्तार चक्र से परिमित
इस मंच से स्वांग हुए है अनवरत
कुछ पात्र छोड गए नेपथ्य में संकेत
भुक्त-त्यक्त-संचित
कथावशेष
रंगावतरण जब होगा
तुम्हारा
लीला पर क्या प्रभाव होगा तुम्हारा?
तुम ही कथा-कथक
हो
इच्छा, ज्ञान, कर्म के
व्यूह में ग्रसित
से
तुम व्यूह के जनक हो
गति में स्तिथि, कोलाहल में
शान्त
युद्ध में तठस्थ, भ्रम ज्ञान-अज्ञान
रति रमण करती घट-पट भ्रमण करती
रूचता ठहरती, जचता टहलती
है आरंभ-अंत क्या?
महानाटक के परिप्रेक्ष्य में
है पात्र का महत्व
क्या?
हर पात्र का चरित्र है
भाव से, कार्य से
हर मुक्त राग
युक्त है
भैरवी की ताल से
© Ratish
Didcot 21st Nov 15
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