July 27, 2014

वैभव Hindi Poem

नक्षत्रों के है व्यूह
या कर की है रेखा
जीवन के अयनों
को जिसने देखा

है देह से तादात्मय
इसका क्या हल है
जन्म से स्वाभाविक
यह आचरण है

है काल, कला, नियति से
ग्रसित श्रम मेरा
क्षणिक है स्वातंत्र्य
यह भ्रम मेरा

माया से नित मलिन है बोध
कर लिया इस विषय पर बौद्धिक शोध
निज देव तू तो रम ही गया लघु रूप में
जब हो सके पूर्णता का वैभव भोग

© Ratish
27th Jul 14

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