नक्षत्रों के है व्यूह
या कर की है रेखा
जीवन के अयनों
को जिसने देखा
है देह से तादात्मय
इसका क्या हल है
जन्म से स्वाभाविक
यह आचरण है
है काल, कला, नियति से
ग्रसित श्रम मेरा
क्षणिक है स्वातंत्र्य
यह भ्रम मेरा
माया से नित मलिन है बोध
कर लिया इस विषय पर बौद्धिक शोध
निज देव तू तो रम ही गया लघु रूप में
जब हो सके पूर्णता का वैभव भोग© Ratish
27th Jul 14
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