October 20, 2013

मृत्यु जीवन विधा


जन्म से हो न कुछ

है यह सुनिश्चित

अन्त हर जीव का

अन्त ही है


है यहाँ जब कर्म

और श्रम सुनिश्चित

आनंद ही जीवन में 

क्यों क्षणिक है?


हैं मरूस्थल, हिम और बंजर

तो खेत, नदियाँ और वन भी हैं


क्षोभ और दुखः क्यों व्याप्त जग में

शान्ति और हर्ष पर क्यों संक्रमण है



अमृत्य पुत्र कहकर मुझे दी यह व्यथा

आज मैं तेरे इस विधा पर भी हसा

जो कुछ भी हूँ मैं पूर्ण ही हूँ

मुझसे कुछ और हो कर तू दिखा
 

19 October, Didcot (long walk with large moon visible )
© Ratish

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