October 12, 2013

नभ, रत्नाकर, धरा



नभ, रत्नाकर, धरा

तृणवत
क्यों जियें
आहत, आक्रान्त
परिस्थितियों से प्लावित ?

दीनता के खेल
खेलकर बने दीन
संचार कर ऐश्वर्य का
हो चिर नवीन

संमुख है तेरे
नभ, रत्नाकर, धरा
हो विस्मृत
यदि इंनमें से ध्येय चुना

हो देव पुत्र
ध्येय का ध्यान दो
एक लक्ष्य है
उसका संधान हो

इस देश काल
का पालनहार तू
सूक्ष्म से वृहद का
विस्तार तू

है आश्चर्य
यहाँ इस खेल में
अधिकों ने दीन
पात्र ही चुना

और तुम
क्या कीमत लोगे जीवन की
नभ, रत्नाकर, धरा
 – बस क्या?
 

© Ratish
Didcot 12th October

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