एक दिन और
हर एक क्षण
गिरता हाथों से
कण कण
घटता रहता निरंतर
“घट – पट” का दव्दं
रहता तृ्प्त मैं
समनांतर
कभी भूला मैं
अपने को इस जग में
कभी भूला यह जग
मुझमें
स्व का भान
कभी अभिमान
कभी विस्मृति
है स्वभाव यह जान
मैं हू़ँ
मैं हू़ँ तब सब है
सब ही तो मैं हू़ँ
तुम हो
© रतीश
No comments:
Post a Comment