कालाग्नि
की वेदी पर
समिधा
चलाचल है
भस्मिभूत
होता जीवन
और
इसका हर पल है
हो
श्वास की अनवरत लय
या
स्पंद-नाद हृदय का
सृष्टि
से पहले लिख डाला
तूने
स्वांग प्रलय का
है
वय से परिमित मेरी
आकांक्षा, अनुसंधान, विजय
पञ्चकृत्य
की आहुति लेता
भूत-भविष्य-वर्तमान
समय
स्वीकार कर यज्ञ में
ये
श्वास
ये
स्पंद-नाद
इदं
न मम
© Ratish
Didcot 26th Feb 2015
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