न किञ्चिदपि कुर्वाणः
सौख्यैर्दुःखान्यपोहति।
तत्तस्य किमपि द्रव्यं
तत्तस्य किमपि द्रव्यं
यो हि यस्य प्रियो जनः॥
भवभूति
भवभूति
बिना कुछ भी किये सुख से (भरता, अनुभूति कराता है) और दुःखों को दूर करता है - जो जिसका प्रिय है वह उसका निश्चय ही अनमोल धन है।
सौख्यै: = सुख से (तृतीया बहुवचन)
दुःखानि = दुःख को (द्वितीयाबहुवचन)
अपोहित = दूर करता है
दुःखानि+अपोहित = दुःखान्यपोहति (यण सन्धि)
दुःखानि = दुःख को (द्वितीयाबहुवचन)
अपोहित = दूर करता है
दुःखानि+अपोहित = दुःखान्यपोहति (यण सन्धि)
Without doing anything they cause pleasure and remove afflictions. Therefore those you love are surely your treasures.
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