बिन कुछ किये भी
धूल जमती रहती है
सासें भी लय के बीच
थमती रहती है
करते हैं हम जो जमा
ये कपड़े लत्ते सब
बनेंगे ये कूड़ा कर्कट
ये पोथी पत्रे सब
न जाने कौन कहाँ से
आया है क्यों हमारे पास
न जाने कब तक रहेगा
ये सब हमारे पास
हो सके तो भुला दो
ये धूल, मिट्टी, मल
सांसें आग सी बना लो
जीवंत, निश्चल, कांत
© Ratish
पूना
17th Nov 2020
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