बना के हम और तुम
तुम हमसे ही उलझ गऐ
अलख को बाँट कर
मेरा तेरा कर गए
देते हो जिसकी द्हाई
क्या
उसे भी जानते हो?
अन्य मतों में निहित
सत्य
को पहचानते हो?
सोचते हो जो जानता हूँ
बस वह सही है
मेरे समझ के दायरे के
बाहर
कुछ भी नहीं है
अहं इदं का भेद भ्रम है
हम और तुम हम है
©Ratish
Pune
24
Nov 18